रविवार, 23 अप्रैल 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #३२१

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३२१)*
*राग सोरठ ॥१९॥**(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
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*३२१. मन की नीकी विनती । मल्लिका मोद ताल*
*मेरे तुम ही राखणहार, दूजा को नहीं ।*
*ये चंचल चहुँ दिशि जाय, काल तहीं तहीं ॥टेक॥*
*मैं केते किये उपाय, निश्‍चल ना रहै ।*
*जहँ बरजूं तहँ जाय, मद मातो बहै ॥१॥*
*जहँ जाणा तहँ जाय, तुम्ह तैं ना डरै ।*
*तासौं कहा बसाइ, भावै त्यों करै ॥२॥*
*सकल पुकारैं साध, मैं केता कह्या ।*
*गुरु अंकुश मानै नाहिं, निर्भय ह्वै रह्या ॥३॥*
*तुम बिन और न कोइ, इस मन को गहै ।*
*तूँ राखै राखणहार, दादू तो रहै ॥४॥*
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हे परमात्मन् ! मेरे मन की रक्षा आप ही कर सकते हैं, दूसरा कोई नहीं । यह मेरा मन बड़ा ही चंचल है और विषयों में ही दौड़ता रहता है । परन्तु मुझे तो यह विषय विष में तुल्य प्रतीत होते हैं । इस मन को रोकने के लिये नाना उपाय किये परन्तु यह नहीं रुका । यह मन विलक्षण स्वभाव वाला है ।
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जहां जहां जाता है वहां वहां से इसको मना करने पर भी नहीं मानता । इसको निषिद्धवस्तु ही प्यारी है, अतः उनके लिये पागल की तरह दौड़ता है । ईश्वर का भी भय नहीं मानता । अपने को प्रिय लगने वाले कर्म ही करता है । इस मन के आगे बुद्धिमानों की भी बुद्धि कुण्ठित हो जाती है । सत्पुरुषों का दिया हुआ ज्ञान भी निष्फल चला जाता है ।
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यह गुरु के वचन रूपी अंकुश को भी तोड़ कर निर्भय हो रहा है । इस विषय रूपी जंगल में घूमते हुए इस मन रूपी सिंह को कोई भी नहीं मार सकता । मुझे तो पूर्ण विश्वास है कि इस मन को आप ही जीत सकते हैं । अतः आप ही मेरे मन को पकड़कर अपने चरणों में रखें, तब ही यह मन अपनी चंचलता को त्याग कर स्थित बैठ सकता है ।
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गीता में –
अर्जुन भगवान् को कहता है कि – हे श्रीकृष्ण ! यह मन बड़ा ही चंचल प्रमथनशील और दृढ़ बलवान् है । इसको वश में करना मैं वायु को रोकने की तरह दुष्कर मानता हूं । भगवान् बोले –
निःसंदेह मन चंचल है इसका रोकना कठिन है, किन्तु अभ्यास और वैराग्य से यह रोका जा सकता है ।
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योगसूत्र में भी –
मन अभ्यास और वैराग्य से ही रोका जा सकता है, ऐसा कहा है । अभ्यास किसको कहते हैं? – चित्त में निरन्तर ब्रह्माकार वृत्ति को बनाये रखने का नाम अभ्यास है । विषयों में जो दृष्ट-अदृष्ट तथा इष्ट हैं, उनमें घृणा पैदा हो जाय तो फिर उससे वैराग्य पैदा हो जाता है ।
(क्रमशः)

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