रविवार, 23 अप्रैल 2023

भूलो रे मन भूलो रे

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*दादू अंतर कालिमा, हिरदै बहुत विकार ।*
*प्रकट पूरा दूर कर, दादू करै पुकार ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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राग मलारगुंड१ ॥१३॥
भूलो रे मन भूलो रे । राम बिसारि र१ डूलो रे ॥टेक॥
साध कहैं सो न कीयौ रे । तैं चुणि चुणि औगुण लियौ रे ॥
हिरदै हरि क्यूं आवै रे । साध न कोई भावै रे ॥
योंही पाप कमायौ रे । तैं जण जण सबदि दुषायौ रे ॥
दीन गरीबी कीजै रे । टीला हरि रस पीजै रे ॥४९॥
(पाठान्तर : १. ‘मलारगुंड’ के स्थान पर केवल ‘गुंड’ है । वैसे दूसरे क्रमांक पर राग गुंड पूर्व में आ चुकी है । २. रु)
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हे मन ! तू भूल गया है, भ्रमित हो गया है । तू रामजी के भजन करने को विस्मृत करके इतस्तत घूमता-फिरता है ।
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तूने कभी भी वह नहीं किया जिसको ब्रह्मनिष्ठ सन्तों ने करने को कहा । उलटे तूने चुन-चुनकर अवगुणों को ही अपने में धारण में किया । ऐसी स्थिति में हरि तेरे हृदय में क्योंकर निवास करेंगे । अरे ! तुझको कोई साधु-संत भी अच्छे नहीं लगते हैं ।
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तूने संसार में अनुरक्त होकर योंही पापों को कमा लिया है । तूने जने-जने को दुःख दिया है । टीला कहता है, अब भी समय है, दीनता और गरीबी को धारण करके रामभजन करता हुआ हरिरस का पान कर ॥४९॥
(क्रमशः)

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