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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*३०. अपारिख कौ अंग ४/६*
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जगजीवन जांणै कहाँ, बसत-विणज३ हरिनांम ।
खारी कै लेबाल४ कौं, हीरा सौं का काम ॥४॥
(३. बसत-विणज=साधारण वस्तु विक्रेता) (४. लेबाल=खल आदि हीन वस्तु लेने वाले)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हरि नाम के व्यापारी जाने कहां रहते हैं ? जो व्यर्थ की वस्तुएं लेने वाले हैं उन्हें हीरे का मूल्य पता नहीं होता ।
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जगजीवन मस्तक रती, रतन चढ़् सो हाथि ।
नजर न आवै निरखतां, तीन लोक की आथि५ ॥५॥
(५. आथि=सम्पति)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिनके मस्तक में राम नाम की रती है, वे जन तो सम्पूर्ण हैं, उनकी स्थिति हाथ में रत्न जैसी है या मणि युक्त हस्ती पर सवार बड़भागी सी है । उनके पास इतना ऐश्वर्य है कि जितनी तीनों लोकों की सम्पदा है यह धन प्रभु प्रतीति है ।
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ज्यू सबदन मंहि साध कहै, त्यूं करि देखै कोइ ।
कहि जगजीवन अलख का, ता कौं दरसन होइ ॥६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिन शब्दों से साधुजन समझाते हैं उस दृष्टिकोण से कोइ विरला ही समझता है । और जो समझता है उसे ही प्रभु दर्शन होते हैं ।
(क्रमशः)

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