रविवार, 2 अप्रैल 2023

*मधुर नृत्य तथा नामसंकीर्तन*

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*पड्या पुकारै पीड़ सौं, दादू बिरही जन ।*
*राम सनेही चित बसै, और न भावै मन ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विरह का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(७)मधुर नृत्य तथा नामसंकीर्तन*
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श्रीरामकृष्ण बैठकखाने के पश्चिम ओर खाट पर लेटे हुए हैं । रात के चार बजे का समय होगा । कमरे के दक्षिण ओर बरामदा है, उसमें एक स्टूल पड़ा हुआ है । उस पर मास्टर बैठे हैं ।
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कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण बरामदे में गये । मास्टर ने भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया । आज संक्रान्ति है, बुधवार, १५ जुलाई १८८५ ।
श्रीरामकृष्ण - मैं एक बार और उठा था । अच्छा, क्या सबेरे दक्षिणेश्वर जाऊँ ?
मास्टर - प्रातःकाल गंगा बहुत कुछ शान्त रहती है ।
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सबेरा हो गया है । भक्तों का आगमन अभी नहीं हुआ । श्रीरामकृष्ण हाथ-मुख धोकर मधुर स्वर से नाम ले रहे हैं । पश्चिमवाले कमरे के उत्तर तरफ के दरवाजे के पास खड़े होकर नाम ले रहे हैं । पास ही मास्टर हैं । थोड़ी देर बाद कुछ दूरी पर गोपाल की माँ आकर खड़ी हुई । अन्तःपुर के द्वार के पास दो-एक स्त्रियाँ श्रीरामकृष्ण को आकर देख रही हैं ।
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राम-नाम करके श्रीरामकृष्ण कृष्ण का नाम ले रहे हैं । "कृष्ण कृष्ण ! गोपी कृष्ण ! गोपी ! गोपी ! राखालजीवन कृष्ण ! नन्दनन्दन कृष्ण ! गोविन्द ! गोविन्द !"
फिर गौरांग का नाम लेने लगे - "गौरांग प्रभु नित्यानन्द, हरे कृष्ण हरे राम राधे गोविन्द !"
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फिर कह रहे हैं - 'अलख निरंजन !' निरंजन कहकर रो रहे हैं । उनका रोना और करुण कण्ठ सुनकर पास में खड़े हुए सब भक्त भी रोने लगे । वे रोते हुए कह रहे हैं - "निरंजन ! आ बेटा, कब तुझे भोजन कराकर जन्म सफल करूँ ! देह धारण करके मनुष्य के रूप में तू मेरे लिए आया हुआ है ।"
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जगन्नाथजी को अपनी विनय सुना रहे हैं - "जगन्नाथ ! जगद्वन्धो ! दीनबन्धो ! मैं संसार से अलग तो हूँ ही नहीं नाथ, मुझ पर दया करो ।"
प्रेमोन्मत्त होकर गा रहे हैं - "उड़ीसा जगन्नाथपुरी में भले बिराजे जी ।"
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अब नारायण का नाम-कीर्तन करते हुए नाच रहे हैं - "श्रीमन्नारायण ! नारायण ! नारायण !"
अब श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ छोटे कमरे में बैठे । दिगम्बर ! जैसे पाँच साल का बच्चा ! बलराम, मास्टर और भी दो-एक भक्त बैठे हुए हैं ।
(क्रमशः)

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