रविवार, 16 अप्रैल 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #३१८

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३१८)*
*राग सोरठ ॥१९॥**(गायन समय रात्रि ९ से १२)*
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*३१८. केवल विनती । रूपक ताल*
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*निरंजन क्यों रहै, मौन गहे वैराग,*
*केते जुग गये ॥टेक॥*
*जागै जगपति राइ, हँस बोलै नहीं ।*
*परगट घूंघट मांहि, पट खोलै नहीं ॥१॥*
*सदके करूं संसार, सब जग वारणै ।*
*छाडूं सब परिवार, तेरे कारणै ॥२॥*
*वारूं पिंड पराण, पावों सिर धरूं ।*
*ज्यों ज्यों भावै राम, सो सेवा करूं ॥३॥*
*दीनानाथ दयाल ! विलंब न कीजिये ।*
*दादू बलि बलि जाय, सेज सुख दीजिये ॥४॥*
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हे ज्ञानी सन्त ! वह निरंजन निराकार प्रभु भक्तों के बिना कैसे सुखी रहते होंगे ? यदि कहो कि उन्होंने तो मौन धारण कर रखा है । उन्हें मौन धारण किये तो बहुत समय पूरा हो गया है, क्या वे सो गये ? जिस से हमारी प्रार्थना भी नहीं सुनते । नहीं, नहीं सखी, वह सोता नहीं, क्योंकि संसार की व्यवस्था के लिये उसको सदा जागना पड़ता है । मैं कैसे मानूं कि वे जागते रहते हैं ? क्योंकि जागते होते तो कभी तो मुझ से हँसकर बातचीत तो करते । 
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हे सखी ! उनका तो स्वभाव ही है कि वे अपनी माया के परदे के पीछे गुप्त रहते हैं । जिसने ज्ञान के द्वारा माया के परदे को नष्ट कर दिया तो वह उनका दर्शन लेता है । आपने ठीक ही कहा है लेकिन मैंने तो सारा सांसारिक प्रपञ्च उनको ही समर्पित कर दिया । 
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हे राम ! मैंने तेरे लिए तो परिवार के बन्धन को भी तोड़ दिया और प्राण भी आपको अर्पित कर दिये और मेरा शिर तो आपके चरण-कमलों में ही सदा निवास करता है । हे राम ! मैं आपकी सेवा आदि कार्य करने में समर्थ हूं, फिर भी आप अपने माया के परदे के पीछे क्यों छिप रहे हैं? हे दयालो दीनबन्धो ! अब आप दर्शन देने में विलम्ब मत करो । मेरी हृदय शैय्या पर आकर मुझे ब्रह्मानन्द से तृप्त करो । बार-बार आपके चरणों में पड़कर निवेदन करता हूं कि दर्शन दीजिये । 
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भक्तिरसायन में कहा है कि –
आपत्ति आने पर भगवान् के चरणों का ध्यान करना चाहिये, जिससे आपत्ति नष्ट हो जाती है । तो वह ध्यान क्या है? चित्त को भगवान् के चरणों में रखना चाहिये या चित्त में भगवान् को बसा लेना चाहिये, जिससे भगवान् के दर्शन होते हैं । हे प्रभो ! हमने तो आपके चरणों का ध्यान भी करके देख लिया, चित्त तो आपके चरणों में भी रख कर देख लिया लेकिन फिर भी आपके दर्शन नहीं हुए, तो फिर आप ही बतलाइये कि वह आपत्ति कौन सी है, वह ध्यान कौन सा है ? जिसके करने से तत्काल आपके दर्शन हो जाते हैं ।
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अति कृपण भी मांगने से लोक-लज्जा के कारण थोड़ा बहुत तो देता ही है, उसको सर्वथा निराश नहीं करता । फिर आप तो समर्पण करने वालों की संपूर्ण कामना पूरी कर देते हैं । यह यश सर्वत्र फैला हुआ है । लेकिन मुझको एक पाद(थोड़ा सा हिस्सा) देना भी आपके लिये भारभूत हो रहा है अर्थात् अपने पाद(चरण) भी नहीं दिखा रहे हैं ।
(क्रमशः)

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