रविवार, 16 अप्रैल 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १३६*

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*दादू जग ज्वाला जम रूप है, साहिब राखणहार ।*
*तुम बिच अन्तर जनि पड़ै, तातैं करूँ पुकार ॥*
(श्री दादूवाणी ~ बिनती का अंग)
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग मारू ९(गायन समय युद्ध)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१३६ विरह व्यथा । त्रिताल
दु:ख अपार बिन दीदार१, लेखा कछु नांहीं ।
विकल२ बुद्धि नांहिं सुधि३, मृतक भई मांही ॥टेक॥
सुख विलास४ सकल नाश, आतम उर भागे ।
मध्य पीर नाहिं धीर, विरह बाण लागे ॥१॥
बहु वियोग परम शोक, डगमगाति डोलै ।
नांहिं चैन विरह बैन, व्याकुल भइ बोलै ॥२॥
तप्त पूरि नांहिं दूरि, मिलिये सुख दाई ।
रज्जब की जलन जाय, प्रकटो हरि आई ॥३॥१॥
१३६-१३८ में विरह दु:ख प्रकट कर रहे हैं -
✦ प्रभु के दर्शन१ बिना मुझे अपार दु:ख है, उसका कोई हिसाब नहीं है । बुद्धि व्याकुल२ रहती है, उसमें कुछ भी ज्ञान३ नहीं रहता, भीतर मृतक सी हो रही है ।
✦ भोग४ सुख सब नष्ट हो गये हैं अर्थात भोगों से सुख नहीं मिल रहा है । मुझ जीवात्मा का हृदय भागता है अर्थात चंचल रहता है भीतर पीड़ा ही बनी रहती है, धैर्य नहीं रहता । हृदय में विरह बाण लग रहे हैं ।
✦ अधिक वियोग रहने से महान शोक हो रहा है काया डगमगाती हुई फिरती है । अर्थात पैर कहीं का कहीं पड़ता है सुख नहीं है । वाणी व्याकुल होकर विरह सबन्धी ही वचन बोलती है ।
✦ दु:ख द्वारा पूर्ण रूप से तप रहा हूँ । यह ताप दूर नहीं हो रही है । सुख दाता हरे ! आप मेरे हृदय में प्रकट होकर मुझ से मिलिये । तभी मेरी जलन मिट सकेगी ।
(क्रमशः)

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