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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२९. संजीवन कौ अंग २१/२५*
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अंन* के आगै उदिक हरि, उदिक तजै ग्रह बाइ ।
कहि जगजीवन बाई तजि, रांम रिदै लिव लाइ* ॥२१॥
*-*. साधक को चाहिये कि वह अपनी साधना में भोजन की मात्रा में कमी करने हेतु सर्वप्रथम अन्न में, तब जल में तथा अन्त में वायु में कमी लाकर लय समाधि में लीन हो जाय ॥२१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि साधक पहले अन्न की मात्रा कम करें । पश्चात जल, फिर वायु में कमी कर लय समाधि में लीन हो जाये ।
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तन मंहि पवन पवन मंहि मन है, मन मंहि बचनबिलास ।
जे चित आवै सोई पावै, कहि जगजीवनदास ॥२२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि देह में वायु है वायु में मन है । मन से वचन है । जो जैसा या जिस क्रम में सोचता है वैसा ही प्राप्त करता है ।
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कहि जगजीवन तन गया, प्रांण न छीजै रांम ।
तुम तजि मन रह्या इत उत भ्रमै, (तो) सरै न कोई काम ॥२३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि देह जाने से प्राण दुखी नहीं होते पर यदि आप स्मरण में न रहो तो जीव इधर उधर भटकता है व कोइ कार्य सम्पन्न नहीं होता है ।
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कहि जगजीवन मन रह्या, तन पणि रहै सचेत ।
मन चंचल चहुँ दिस फिरै, रांम न भजै अचेत ॥२४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मन वश में रहे व देह जागृत अवस्था में हो यह ही उचित है । यदि मन भटकता रहे व स्मरण न करे तो यह उसकी अचेत अवस्था है ।
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घड़ी महूरत एहि सुख, पीव सौं कीजै बात ।
कहि जगजीवन रांम रमै, हरि मंहि अंग समात ॥२५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीवन में जो थोड़ा बहुत सुख है वह प्रभु से सम्वाद ही है । हर समय स्मरण हो व देह प्रभु में ही लीन रहै ।
इति संजीवन कौ अंग संपूर्ण ॥२९॥
(क्रमशः)

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