रविवार, 9 अप्रैल 2023

*रे मन जाहिलौ रे*

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*रे मन साथी माहरा, तूनें समझायो कै बारो रे ।*
*रातो रंग कसुंभ के, तैं बिसार्यो आधारो रे ॥*
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*संत टीला पदावली*
*संपादक ~ ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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राग रामगिरी१ ॥१०॥
रे मन जाहिलौ रे, वारै कछु न आयौ हाथ ।
घर मांहैं आवै नहीं, फिरै पंच कै साथ ॥टेक॥
स्वाण्यौं२ तूं सोवै नहीं, बैठौ करै उपाधि ।
गोब्यंद३ नैं सुमिरै नहीं, यहु मन बड़ौ असाधि ॥
साधां सूं सनमुष नहीं, हरि सूं४ नांहीं हेत ।
ज्यूं आयौ त्यूंही चल्यौ, मूरिष बड़ौ अचेत ॥
यहु औसर पावै नहीं, गुर दादू कौ साथ ।
टीला चेति हुस्यार हो, गहै रामजी हाथ ॥४३॥
(पाठान्तर : १. रामकली, २. स्वाण्यूं, ३. गोविन्द, ४. स्यूं)
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प्राणी को सावधान करते हुए कहते हैं, यह मन जाहिल है जिसके कारण तुझको कुछ भी लाभ नहीं हुआ । यह मन अपने घर=आत्मचिन्तन में संलग्न नहीं होता उलटे पाँचों स्वादों के आस्वादन हेतु पाँचों इन्दिर्यों के साथ-साथ रमण करता फिरता है ॥टेक॥
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सुलाने पर तू सोता नहीं है । जागृत रहता है तब कुछ न कुछ उपद्रव करता है । गोविन्द का स्मरण नहीं करता है । वस्तुतः यह मन बहुत ही असाध्य है ।
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साधुओं के सन्मुख= शरणागत नहीं होता है । परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा-हरि से प्रीति नहीं करता है । अतीव असावधान मूर्ख प्राणी जैसा आया था, वैसा ही रीता का रीता चला जाता है ।
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हे मूर्ख ! गुरुमहाराज दादू के सत्संग का यह अवसर पुनः मिलने वाला नहीं है । अतः टीला कहता है सावधान होकर होशियार हो जा, रामजी स्वरूप दादूजी महाराज का सत्संग कर ले जिससे कि रामजी तेरे हाथ को थाम लें । रामजी तेरे हाथ को थाम लेंगे ॥४३॥
(क्रमशः)

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