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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*साहिबजी सब गुण करै, सतगुरु के घट होइ ।*
*दादू काढे काल मुख, निगुणा न मानै कोइ ॥*
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*गुर द्रोही बिणास कौ अंग ॥*
भसमागिरि संभू छल्यौ, तौ काँयौं हूवौ ।
गौरी जिहीं की तिहिं मिली, सोई जलि मूवौ ॥२९॥
भस्मासुर ने आशुतोष शंकर को छलने का प्रयत्न किया किन्तु परिणाम क्या हुआ ? भस्मासुर ने जिस गौरी को प्राप्त करने के लिये शंकर से छल किया वह गौरी तो शंकर की ही थी और उसी को मिल गई किन्तु छलकर्ता भस्मासुर जलकर मर गया । अतः गुरु से ज्ञान प्राप्त करके कभी भी गुरु से द्रोह नहीं करना चाहिये । काकभुंशुंडी का अन्य दूसरा उदाहरण दृष्टव्य है ॥२९॥
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*गुर दया प्रताप कौ अंग ॥*
जन रज्जब नैं संपदा, गुर दादू बकसी आप ।
बषनां कै किहुँ आपदा, याँ चरणाँ कौ परताप ॥३०॥
बषनांजी गृहस्थ संत थे । एक बार उनकी पत्नी ने पूछा, स्वामी ! आप और रज्जबजी दोनों ही दादूजी महाराज अनन्य शिष्य हैं किन्तु जो वैभव, मान-प्रतिष्ठा रज्जबजी को प्राप्त है, वह आपको नहीं है । क्या दादूजी की आप पर कृपादृष्टि कम है इस पर बषनांजी ने उक्त साषी कही जिसका सरलार्थ है । भक्तप्रवर रज्जबजी को वैभव मान-प्रतिष्ठा दादूजी महाराज स्वयं ने बक्षीस की है । वे समदर्शी हैं । उन्होंने मुझे बक्षीस की है किन्तु मेरे साथ तुम्हारा निवास होने से मैं गृहस्थ हूँ जिस कारण मेरी अपेक्षाकृत मान-प्रतिष्ठा जानता-जनार्दन कम करती है । अतः मेरे यहाँ जो धन की कमी है, उसमें दादूजी की कृपा का न होना कारण न होकर तुम्हारा मेरे साथ रहना है ॥३०॥
इति गुरुदेव कौ अंग संपूर्ण भवेत् ॥अंग २०॥ साषी ३०॥
(क्रमशः)

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