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*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३६. निंदा कौ अंग १/३*
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निंदक पापी दोजगी१, भूंकि२ मरै ज्यूं स्वान३ ।
जगजीवन ते क्यूं बदै४, जिनके आतम ग्यांन ॥१॥
{१. दोजगी=दोजखी(नारकीय जीव)} (२. भूंकि मरै=भौंकता हुआ मरता है) (३. स्वान=कुत्ता) (४. बदै=नष्ट हों)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि निदंक नर्क में जाने वाले पापी जैसा है, जो कुत्ते जैसे भौंक भौंक के मर जाता है, जिनके ह्रदय में राम होते हैं वे कभी नष्ट नहीं होते हैं ।
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जगजीवन निंदा करैं, ते नर नरकहिं जांहि
लख चौरासी जौंण में, भ्रम भ्रम आवै मांहि ॥२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो दूसरों की निंदा करते हैं वे नर नर्क में जाते हैं । जीव चौरासी लाख योनियों में भ्रमित हो डोलता रहता है ।
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खग५ खर६ सूकर७ स्यूं बुरा, पर निंदा जिहिं देह ।
जगजीवन रांम बिमुख कै, अंत पड़ी मुख खेह ॥३॥
(५. खग=पक्षी) (६. खर=गधा) (७. सूकर=सूअर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो नर निंदा करते हैं वे पक्षी, गर्दभ, शूकर, से भी हेय हैं । जो पर निंदा करते हैं संत कहते हैं कि वे प्रभु विमुख हैं उनके मुंह में अंत समय में धूल या राख ही पड़ती है ।
(क्रमशः)

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