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*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।*
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*लोकनाथजी गोस्वामी*
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*कृष्ण जु चैतनि के भृत उत्तम,*
*लोकहु नाथ सबै सुखदाई ।*
*कृष्ण प्रियासु विहार रहै मन,*
*ज्यों जल मीन निशा दिन जाई ॥*
*भागवतं रस गान सु प्रान हि,*
*गावत हैं तिन से मितराई ।*
*माग चलै पगु लागि रसिक्कसु,*
*नेह सु रीति दया तैं जिताई ॥३४९॥*
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लोकनाथजी महाप्रभु श्रीकृष्ण चैतन्य जी के श्रेष्ठ शिष्य थे और सभी को सुख देने वाले थे । श्रीराधाकृष्ण जी के लीला रूप विहार में आपका मन सदा लगा रहता था ।
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जैसे मच्छी के रात्रि दिन जल में ही व्यतीत होते हैं, वैसे ही आपके रात्रि-दिन राधाकृष्ण की भक्ति में ही व्यतीत होते थे ॥ वृन्दावन धाम में आपका अति प्रेम था ।
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श्रीमद्भागवत का गायन रूप रस आपके प्राणों के समान था । जो श्रीमद्भागवत का गायन करते थे, उनसे आप मित्रता करते थे और कहते थे कि ये हमारे मित्र हैं ।
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एक दिन भागवत रस के रसिकशिरोमणि आम मार्ग चलते हुये एक सज्जन को श्रीमद्भागवत गाते हुये सुनकर उसके चरणों में पड़ गये थे और दया करके प्रेम की यह उत्तम रीति सबको बता दी, जिससे श्रीमद्भागवत के महात्म्य का ज्ञान और उसमें अन्य की भी श्रद्धा हो । एक दिन इनके ठाकुरजी के भूषण चोर चुराकर चल दिये किन्तु थोड़ी ही दूर जाकर अन्धे हो गये और लौटकर पीछे वहाँ ही आ गये । आपके चरणों में पड़ गये । आपने उन पर कृपा ही की थी ।
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५. हृषीकेशजी — ने भी वृन्दावन की मधुर भक्ति का रसपान करके परम तृप्ति लाभ की थी ।
(क्रमशः)
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