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*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३७. निगुणां कौ अंग १/४*
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निगुणां सेती गुण किया, निरफल जांहि अचेत ।
जगजीवन ऊसर बोयाँ, कहि क्यूं निपजै खेत ॥१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु की सत्ता को न मानकर यदि कुछ उद्यम किया तो वह निःफल ही जायेगा जैसे बंजर भूमि में बोया बीज निष्फल हो जाता है ।
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निगुणा सगुंणा का कहै, जिन मंहि भगति न भाव ।
कहि जगजीवन जहँ नीर नहिं, तहां क्यों चाले नाव ॥२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव सगुण, निर्गुण क्या करता है यदि अंतर में भक्ति का भाव नहीं है । संत कहते है कि जहां जल ही नहीं है वहां नाव कैसे चलेगी ।
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हरि तजि औगुण राख चित, दुःख कर देह दहंत ।
कहि जगजीवन अलख हरि, ते नहिं साध कहंत ॥३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु को छोड़कर अवगुण चित में रखते हैं उनकी देह दुख से जलती रहती है संत कहते हैं कि वे प्रभु पर भरोसा करनेवाले साधु नहीं हैं ।
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दिल दाझै४ दुरमति५ ह्रिदै, जिनके मांही दोख ।
जगजीवन हरि थैं बिमुख, तिनकी मुकति न मोख ॥४॥
(४. दाझै=जला दे) (५. दुरमति=दुर्मति=कुबुद्धि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो दूसरों का दिल जलाते हैं जो दुर्बुद्धि है जिनके हृदय मे ये दोष है वे प्रभु विमुख हैं उनकी मुक्ति व मोक्ष कुछ भी नहीं हो सकता है ।
(क्रमशः)

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