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*दादू रमता राम सौं, खेलैं अन्तर मांहि ।*
*उलट समाना आप में, सो सुख कतहुँ नांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*सेव करै प्रभु की निज हाथन,*
*भक्ति प्रतीति पुराण हु गाई ।*
*देत हुते चवका शिष ले धन,*
*आवत ही भृत सँन जनाई ॥*
*हाथ पखारि विराज हु आसन,*
*चाव उही खिज के समझाई ।*
*हेत हरी पर आश तजी जग,*
*प्रेम गये पग१ रीति दिखाई ॥३४५॥*
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प्रभु के प्रेम की सेवा-पूजा नित्य आप अपने ही हाथों से किया करते थे । क्योंकि- भक्ति की रीति, प्रीति, प्रतीति, प्रताप जिस प्रकार श्रीमद्भागवतपुराण आदि ग्रंथों में कथन की गयी है, सो सब आप भली भांति जानते थे ।
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एक दिन आप पूजा के लिये चौका लगा रहे थे । उसी समय एक आपका शिष्य भेंट देने के लिये बहुत सा धन लेकर आया था । उसे आया हुआ देख कर एक आपके सेवक ने आपके पास आकर संकेत से बताया कि-अमुक सेवक आ रहा है....
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आप हाथ धोकर आसन पर विराजें, चौका में लगा दूँगा, किन्तु आपके तो उस सेवा का ही उत्साह था । अतः आपने उसकी बात सुनकर तथा कुछ कुपित सा होकर, उसे समझाया कि- मैं अपना सेवा का कार्य छोड़कर आसन पर कैसे बैठ जाऊँ ? यह ऐसा कौन सा महान कार्य है ? जिसके लिये भगवत्सेवा छोड़ दी जाय ।
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सेवक आता है तो मुझे सेवा करते देखकर, वह स्वयं भी प्रभु की सेवा करने में प्रवृत्त होगा । आपका प्रेम हरि में ही था । आप ने जगत् के अन्य प्राणियों की आशा त्याग दी थी । प्रभु- प्रेम में आप निमग्न१ हो गये थे और अपने संपर्क में आने वालों को भी प्रभु-प्रीति की रीति भली प्रकार बताई थी ।
(क्रमशः)

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