🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी. @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
.
*३५. किस्तूरिया म्रिग कौ अंग १२/१४*
.
मांहि रहै मांहै कहै, मांही हरि गुण गाइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, सतगुरु परसै ताहि ॥१२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो अंतर में रहै अंतर, अंतर में ही प्रभु महिमा गाये । उन्हें ही प्रभु आकर मिलते हैं ।
.
मांहै कर मांहै चरण, मांहै बदन बिगाग ।
बाहरि भ्रमै कुरंग ज्यूं, सु कहि जगजीवनदास ॥१३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हाथ पांव सभी चेष्टाएँ अंतर में हो । सारी देह अंतर से नियंत्रण में हो फिर हिरण जैसे जीव बाहर क्यों डोले ।
.
तेज पुंज भासै निकट, जीव न जांणै ताहि ।
कहि जगजीवन दूसरी, आन बस्तु की चाहि ॥१४॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि तेजपुंज समीप भासे फिर भी जीव उसे न समझे उसका कारण है कि वह प्रभु को छोडकर अन्य वस्तु की लालसा करता है ।
इति किस्तूरिया म्रिग कौ अंग संपूर्ण ॥३५॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें