गुरुवार, 29 जून 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १६६*

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*यहु रस मीठा जिन पिया, सो रस ही मांहि समाइ ।*
*मीठे मीठा मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ५८)
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
अथ राग वसंत १४(गायन समय प्रभात ३-६ बजे तथा वसंत ॠतु)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१६६ रस-मत्त । त्रिताल
मतवाले रे मतवाले,
निर्मल भक्ति प्रेम रस पीवै, देह गलित१ गुण गाले२ ॥टेक॥
विरह दरीबे३ में जन बैठे, पल पल पीवै प्याले ।
विसरे देह गेह सुख सम्पति, माया ओढन डाले ॥१॥
भाठी४ भाव सुधा रस निकसे, सुरति मंडी५ तिस नाले६ ।
मगन होय पंचों मिल बैठे, निमष सके नहिं चाले ॥२॥
अह निशि सदा एक रस लागे, बैठि इंकत निराले७ ।
रज्जब चरण शरण तिन चेरा, जे रस रूप विचाले८ ॥३॥१॥
प्रेम भक्ति में मत्त संतों का परिचय दे रहे हैं -
✦ जिनने निर्मल प्रेमाभक्ति रूप रस पान करते हुये देहाभिमान को नष्ट१ करके गुणों को नष्ट२ कर डाला है, वे मतवाले हो रहे हैं ।
✦ विरह रूप बाजार३ में बैठे हुये संत जन क्षण क्षण में प्रेम भक्ति रूप रस का प्याला पीते रहते हैं । रसमें मत्त होकर शरीर, घर, सांसारिक सुख और संपत्ति को भूल जाते हैं । माया रूप ओढने के वस्त्र को दूर डाल देते हैं ।
✦ श्रद्धा रूप भट्टी४ के पास से प्रेमाभक्ती रूप रस निकलता है । उनकी वृत्ति उस श्रद्धा रूप भट्टी के पास६ बैठकर उक्त रस के पान में लगी५ रहती है । पंच ज्ञानेन्द्रिय भी रस पान में निमग्न होकर मनोवृति के साथ ही बैठी रहती है । मन की वृत्ति के बिना वे एक निमिष भी अन्यत्र नहीं जा सकतीं ।
✦ इस प्रकार उनके मन इन्द्रिय विषयों से अलग७ हो, एकान्त में बैठकर दिन रात सदा एकरस भक्ति रस पान में लगे रहते हैं । जो सदा उक्त प्रकार भक्ति रस के बीच८ में ही निमग्न रहते हैं, मैं उनका सेवक होकर उनके चरण कमलों की शरण हूँ ।
(क्रमशः)

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