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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३४८)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
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*३४८. परिचय परीक्षा । यति ताल*
*राम मिल्या यूँ जानिये, जाको काल न व्यापै ।*
*जरा मरण ताको नहीं, अरु मेटै आपै ॥टेक॥*
*सुख दुख कबहुँ न ऊपजै, अरु सब जग सूझै ।*
*कर्म को बाँधै नहीं, सब आगम बूझै ॥१॥*
*जागत ह्वै सो जन रहै, अरु जुग जुग जागै ।*
*अंतरजामी सौं रहै, कछु काई न लागै ॥२॥*
*काम दहै सहजैं रहै, अरु शून्य विचारै ।*
*दादू सो सब की लहै, अरु कबहुं न हारै ॥३॥*
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आत्मा के साक्षात्कार किये हुए जीवन्मुक्त के लक्षण बतला रहा हैं । जिसने भगवान् के स्वरूप को प्राप्त कर लिया है, उसको यम का भी भय नहीं लगता क्योंकि वह ब्रह्म रूप हो गया है ।
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कठोपनिषद् में कहा है कि –
इसी के भय से अग्नि तपता है सूर्य तपता है । तथा इसी के भय से इन्द्र वायु पाचवें मृत्यु देवता अपने-अपने काम में प्रवृत्त रहते हैं । बुढ़ापा मरण आदि शरीर धम्रों से भी वह व्याप्त नहीं होता ।
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क्योंकि वह तो आत्मस्वरूप है । किसी भी पदार्थ का अभिमान नहीं करता । वियोगजन्य दुःखों से तथा अभिलषित पदार्थों की प्राप्ति से प्रसन्न नहीं होता । क्योंकि सारे पदार्थ मायिक होने से मिथ्या है । मिथ्या पदार्थों की प्राप्ति या नाश से कोई भी प्रसन्न या दुःखी नहीं होता ।
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इसी अभिप्राय से गीता “यो न ह्र्ष्यति ब द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति” ऐसा कहा हैं । जीवन्मुक्त का कोई कर्मों से बन्धन नहीं होता । श्रुति में कहा है कि ज्ञानी की हृदयग्रन्थि नष्ट हो जाती है । सारे संशय निवृत्त हो जाते हैं और सारे कर्म ध्वस्त हो जाते हैं । क्योंकि उसने उस परावर परमात्मा को जान लिया और वह मोह निशा में नहीं सोता, कारण कि उसके अज्ञान के नष्ट हो जाने से अज्ञानकार्य मोह आदि की उत्पत्ति नहीं हो सकती ।
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अतः ज्ञानी सर्वदा जागता रहता है । प्रत्यगात्मा से अभिन्न होने के कारण वह सर्वविकार रहित होता है आत्मज्ञान से जिसके काम क्रोध आदि नष्ट हो गये हैं तथा जो सदा ब्रह्म विचार में संलग्न है । वह संसार में व्यवहार करता हुआ भी आकाश की तरह निर्लेप तथा सब धर्मों से अतीत हो जाता है । किसी का पक्ष लेकर वाद-विवाद नहीं करता । किन्तु सदा ब्रह्मनिष्ठ रहता है ।
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गीता में लिखा है कि – अपने अधीन किये हुए अन्तःकरणवाला तथा वश में की हुई रागद्वेष से रहित इन्द्रियों द्वारा शब्दादिविषयों को प्राप्त करता हुआ भी ज्ञानी महात्मा प्रसाद स्वच्छता(आत्मा के साक्षात्कार की योग्यता) को प्राप्त हो जाता है । क्योंकि रागद्वेष से प्रयुक्त इन्द्रियाँ ही दोष की हेतु हैं ।
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जब मन वश में है तो रागद्वेष पैदा ही नहीं हो सकते, उनके अभाव में तदधिना इन्द्रिय प्रवृत्ति भी नहीं हो सकती । अवर्जनीय जो विषयों की उपलब्धि हैं वह दोषजनक नहीं मानी जाती जिससे ज्ञानी का चित्त व्यवहारकल में भी स्वच्छ रहता है । अर्थात् अबाधित आत्मज्ञान के सामर्थ्य से बाधित जो भेद प्रतीति है, वह दोष को पैदा नहीं कर सकती ।
(क्रमशः)

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