सोमवार, 12 जून 2023

कटोवा के वैष्णव

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*मन चित मनसा पलक में, सांई दूर न होइ ।*
*निष्कामी निरखै सदा, दादू जीवन सोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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कटोवा के वैष्णव श्रीरामकृष्ण से प्रश्न कर रहे हैं । वैष्णवजी कुछ कंजे हैं ।
वैष्णव - महाराज, क्या पुनर्जन्म होता है ?
श्रीरामकृष्ण - गीता में है, मृत्यु के समय जिस चिन्ता को लेकर मनुष्य देह छोड़ता है, उसी को लेकर वह पैदा होता है । हरिण की चिन्ता करते हुए देह छोड़ने के कारण महाराज भरत को हरिण होकर जन्म लेना पड़ा था ।
वैष्णव - यह बात होती है इसे अगर कोई आँख से देखकर कहे तो विश्वास भी हो ।
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श्रीरामकृष्ण - यह मैं नहीं जानता, भाई । मैं अपनी बीमारी ही तो अच्छी नहीं कर सकता, तिसपर मरकर क्या होता है – यह प्रश्न !
“तुम जो कुछ कह रहे हो, ये हीन बुद्धि की बातें हैं । किस तरह ईश्वर में भक्ति हो, यह चेष्टा करो । भक्ति-लाभ के लिए ही आदमी होकर पैदा हुए हो । बगीचे में आम खाने के लिए आये हो, कितनी हजार डालियाँ हैं, कितने लाख पत्ते हैं, इसकी खबर लेकर क्या करोगे ? - जन्मान्तर की खबर !”
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श्रीयुत गिरीश घोष दो-एक मित्रों के साथ गाड़ी पर चढ़कर आये । कुछ शराब भी उन्होंने पी थी । रोते हुए आ रहे हैं । श्रीरामकृष्ण के पैरों पर मस्तक रखकर रो रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण सस्नेह उनकी देह में मीठी थपकियाँ मारने लगे । एक भक्त को पुकारकर कहा, - ‘अरे, इसे तम्बाकू पिला ।’
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गिरीश सिर उठाकर हाथ जोड़ कह रहे हैं –“तुम्ही पूर्ण ब्रह्म हो, यह अगर सत्य न हो तो सब मिथ्या है ।
“बड़ा खेद रहा, मैं तुम्हारी सेवा न कर सका । (ये बाते वे एक ऐसे स्वर में कह रहे हैं कि भक्तों की आँखों में आँसू आ गये - वे फूट-फूटकर रो रहे हैं ।)
“भगवन् ! यह वर दो कि साल भर तुम्हारी सेवा करता रहूँ । मुक्ति क्या चीज है ! - वह तो मारी मारी फिरती है - उस पर मैं थूकता हूँ । कहिये सेवा एक साल के लिए करूँगा ।”
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श्रीरामकृष्ण - यहाँ के आदमी अच्छे नहीं हैं । कोई कुछ कहेगा ।
गिरीश - वह बात न होगी, आप कह दीजिये –
श्रीरामकृष्ण - अच्छा, तुम्हारे घर जब जाऊँ तब सेवा करना ।
गिरीश - नहीं, यह नहीं । यहीं करूँगा ।
श्रीरामकृष्ण ने हठ देखकर कहा, ‘अच्छा, ईश्वर की जैसी इच्छा ।’
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श्रीरामकृष्ण के गले में घाव है । गिरीश फिर कहने लगे, “कह दीजिये, अच्छा हो जाय । अच्छा, मैं इसे झाड़े देता हूँ – काली ! काली !”
श्रीरामकृष्ण - मुझे लगेगा ।
गिरीश - अच्छा हो जा (फूक मारते हैं)
"क्या अच्छा नहीं हुआ ? - अगर आपके चरणों मे मेरी भक्ति होगी तो अवश्य अच्छा हो जायेगा - कहिये अच्छा हो गया ।”
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श्रीरामकृष्ण (विरक्ति से) - जाओ भाई, ये सब बातें मुझसे नहीं कही जातीं । रोग के अच्छे होने की बात माँ से मैं नहीं कह सकता ।
“अच्छा, ईवर की इच्छा से होगा ।”
गिरीश - आप मुझे बहका रहे हैं । आपकी ही इच्छा से होगा ।
श्रीरामकृष्ण - छि:, ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए । भक्तवत् न तु कृष्णवत् । तुम्हें जैसा रुचे सोच सकते हो - अपने गुरु को भगवान समझ सकते हो, परन्तु इन सब के कहने से अपराध होता है । ऐसी बातें फिर नहीं कहना ।
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गिरीश - कहिये, अच्छा हो जायेगा ।
श्रीरामकृष्ण - अच्छा, जो कुछ हुआ है वह चला जायेगा ।
गिरीश शायद अब भी अपने नशे में हैं । कभी कभी बीच में वे श्रीरामकृष्ण से कहते हैं, “क्या बात है कि इस बार आप अपने दैवी सौन्दर्य को लेकर पैदा नहीं हुए ?”
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कुछ देर बाद फिर कह रहे हैं - “अबकी बार जान पड़ता है, बंगाल का उद्धार है ।”
एक भक्त अपने आप से कह रहे हैं, “केवल बंगाल का ही क्यों ? समस्त जगत् का उद्धार होगा ।”
गिरीश फिर कह रहे हैं – “ये यहाँ क्यों हैं, इसका अर्थ किसी की समझ में आया ? जीवों के दुःख से विकल होकर आये हैं, उनका उद्धार करने के लिए ।”
(क्रमशः)

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