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*दादू जब दिल मिली दयालु सौं,*
*तब अंतर कुछ नांहि ।*
*ज्यों पाला पाणी कों मिल्या,*
*त्यों हरिजन हरि मांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*४. विपुल बीठलजी*
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*बीठलदास बड़े हरिदास जु,*
*दाह उठी गुरु के सु वियोगा ।*
*रास समाज विराज बड़े जन,*
*बोल लिये सुन आवत योगा ॥*
*देख विहार जुगल्लकिशोर हु,*
*गान रु तान सुने मन शोगा२ ।*
*जाय मिले उन भाव धर्यो तन,*
*और गये सब देखत लोगा ॥३४८॥*
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विपुल बीठलजी लीला तथा गुरुनिष्ठा के भक्त थे और स्वामी हरिदास जी के बड़े शिष्य थे । अपने श्रेष्ठ गुरुजी के परमधाम पधारने पर गुरुवियोग से आपके हृदय में अति दुःख रूप दाह हुआ था । आप कहीं जाते नहीं थे ।
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एक रात्रि को वृन्दावन में रास समाज में महान् पुरुष विराजे हुए थे । उस समय उन महानुभावों ने आपको भी बुलाया । तब उनकी आज्ञा से आप आकर उन महानुभावों से मिल कर विराजे ।
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उस समय श्रीयुगल सरकार की लीला का दर्शन करके तथा गान और तान की अपार माधुरी सुनकर वियोग जन्य दुःख-शोक२ बढ जाने से आप बेसुध हो गये ।
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उसी अवस्था में श्रीगुरु हरिदास जी और युगल सरकार का दिव्य दर्शन करके विपुल बीठल जी रस-सागर में निमग्न हो गये और जो भाव आपने हृदय में धारण किया था, शरीर को छोड़कर, उसी में जा मिले । फिर और सब लोग भी आपकी भक्ति को देखते हुए और आपका जयघोष करते हुए अपने अपने स्थानों को चले गये ॥
(क्रमशः)

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