शुक्रवार, 23 जून 2023

*३६. निंदा कौ अंग ७/९*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी. @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
.
*३६. निंदा कौ अंग ७/९*
.
जिनकी रसनां रस नहीं, प्रेम भगति नहीं प्यास ।
ते नर नागा१३ मनमुखी, सु कहि जगजीवनदास ॥७॥
१३. नागा=नग्न (निर्लज्ज) ।
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिनकी जिह्वा में मधुरता नहीं है । जिन्हें प्रेम भक्ति की प्यास नहीं है । वे जीव निर्लज्ज स्वेच्छाचारी है ऐसा संत कहते हैं ।
.
खर की सीख१ र ऊचरै, रांम भगति बिन स्वान ।
कहि जगजीवन हरि तज दसि२ दे, तिहिं तत आंख न कान ॥८॥
(१. खर की सीख=मूर्ख की शिक्षा) (२. दसि=कह दे)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मूर्ख या गधे जैसे लोगों की शिक्षा पा बिना प्रभु की भक्ति के मूर्ख जन र शब्द का उच्चारण करते हैं ।
.
साधन की निन्दा करै, अपसद३ भाखैं आंन ।
जगजीवन ते सुनत हैं, फूटॏं तिन का कांन ॥९॥
(३. अपसद=अपशब्द=गाली गलौज)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु पाने के साधन जप तप की जो निंदा करते हैं और अपशब्द का उच्चारण करते हैं और दूसरो को कहते हैं । उनकी बात जो सुनते उनके कान ही फट जायें ।
इति निन्दा को अंग संपूर्ण ॥३६॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें