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*सकल शिरोमणि बुनै विचारा, सान्हां सूत न तोड़ै ।*
*सदा सचेत रहै ल्यौ लागा, ज्यौं टूटै त्यौं जोड़ै ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २९८)
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग सोरठ १३ (गायन ९ से १२ रात्रि वा वर्षा ॠतु)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१६४ मनोपदेश । कहरवा
रे सुन कोली प्राण१ हमारा, तू करिले काम सँवारा२ ।
करगहि३ बैठि गजी४ बुणि लीजे, बढता५ भला तुम्हारा ॥टेक॥
नौ सौ पूरि६ निरंतर तांणां, भाव भक्ति करि भेवो७ ।
मांडी महर८ तेल तत्व निर्मल, प्रेम छांट दे लेवो ॥१॥
बैठि विचार सुनि फणी९ फहम१० की, सर्व सूत भरि लीजे ।
मन चित लाय कृत्य११ करि कोली, तार न टूटण दीजे ॥२॥
बाणें बाहि१२ वस्तु वित१३ ऊंचा१४, ज्यों१५ उस हाटि विकावै ।
लेऊ राम महा अति चौकसि१६, और न नीड़ै१७ आवै ॥३॥
ऐसी समझि१८ बुणी रे बुणकर, फेरी ऊलटि नहीं आवै ।
रज्जब रहै राम घर रेजा, दर्श दाति१९ वित२० वित पावै ॥४॥२॥
मन को ज्ञान रूप वस्त्र बनाने का उपदेश कर रहै हैं -
✦ अरे हमारे मन१ रूपी कोली ! तू हमारी बात सुनकर अपने ज्ञान रूप वस्त्र बनाने का काम अच्छी२ प्रकार कर ! शरीर रूप करघा३(वस्त्र बनाने का स्थान) पर बैठकर ज्ञान रूप वस्त्र४ बुन ले । इससे तेरे भले पन की वृद्धि५ होगी ।
✦ निरंतर नौ सौ नाड़ियों को ताणों में लगा६ और भाव भक्ति रूप जल से भिगो७ । हरि गुरु दया८ की मांडी बना और उसमे निर्मल तत्त्व विचार रूप तेल डाल कर ताणों के सूत में लगा तथा प्रेम रूप जल से छाँट छाँट कर काम में ले ।
✦ विचार पूर्वक बैठकर बुद्धि१० रूप नलिका९ में साधन करने की भावना रूप बाँणा का सूत भर ले । अरे मन रूपी कोली ! सुन, पीछे चित लगाकर काम११ कर । साधन भावना रूप तार टूटने मत दे अर्थात निरंतर साधन कर ।
✦ बाणें के तारों को ताणें में डालकर१२ ब्रह्म साक्षात्कार रूप श्रेष्ठ१४ धन१३ देने वाली वस्तु तैयार कर, जिससे१५ उस ब्रह्म की निर्द्वन्द्वावस्था रूप हाट पर बिक सके । निरंजन राम ही बड़ी सावधानी१६ से ग्रहण करें और कोई भी समीप१७ भी न ही आवे ।
✦ संशय विपर्य्य रहित ऐसी बुद्धि१८ से निर्दोष ज्ञान रूप वस्त्र बुण जिसके बुणने पर जीवित्मा पुन: लौटकर संसार में नहीं आवे । जीवात्मा को दर्शन दान१९ रूप धन२० मिले स्वरूप घर में ही रहे, राम से अलग नहीं रहे । मूक्तावस्था में ज्ञाता ज्ञान, ज्ञेय, तीनों एक ही हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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