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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३४६)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
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*३४६. पतिव्रता । राज विद्याधर ताल*
*मूल सींच बधै ज्यों बेला, सो तत तरुवर रहै अकेला ॥टेक॥*
*देवी देखत फिरै ज्यों भूलै, खाइ हलाहल विष को फूलै ।*
*सुख को चाहे पड़ै गल फाँसी, देखत हीरा हाथ तैं जासी ॥१॥*
*केई पूजा रच ध्यान लगावैं, देवल देखैं खबर न पावैं ।*
*तोरैं पाती जुगति न जानी, इहि भ्रम भूल रहै अभिमानी ॥२॥*
*तीर्थ व्रत न पूजै आसा, वन खंड जाहिं रहैं उदासा ।*
*यूं तप कर-कर देह जलावैं, भरमत डोलैं जन्म गवावैं ॥३॥*
*सतगुरु मिलै न संशय जाई, ये बँधन सब देइ छुड़ाई ।*
*तब दादू परम गति पावै, सो निज मूरति मांहि लखावै ॥४॥*
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जैसे वृक्ष तथा लता के जड़ में जल देने से उसकी शाखा प्रशाखाओं का सिंचन स्वयमेव हो जाता है और जल सिंचन से वे वृद्धि को भी प्राप्त होते हैं । परन्तु समय आने पर जब पत्ते सूख जाते हैं तो गिर जाते हैं । केवल मूल ही शेष रहता है । ऐसे ही सबका मूल कारण ब्रह्म है, उसकी उपासना से देवताओं की उपासना स्वयमेव हो जाती है ।
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प्रलय में जब सबका विनाश हो जाता है तब ब्रह्म ही शेष रहता है । क्योंकि वह अविनाशी है । अतः सभी साधकों को ब्रह्म की ही उपासना करनी चाहिये । जैसे कोई विष खाकर भ्रान्ति से अपनी मृत्यु को भूलकर इधर-उधर घूमता रहता है ऐसे ही देवोपासक भी भक्ष्य अभक्ष्य कर बिना विचार किये ही मद्य, मांसादिकों को खाकर उसके परिणाम को न सोचकर केवल देवदर्शन से ही अपने को कृतकृत्य मानते हुए संसार में भटकते रहते हैं ।
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अन्त में उनको दुःख ही प्राप्त होता है क्योंकि सकाम देवोपासना से आज तक किसी को मुक्ति प्राप्त नहीं हुई है । किन्तु बार-बार जन्म मरण के द्वारा संसार में कष्ट ही पाते रहते हैं । अन्त में यम के पाशों से बंधकर पीड़ित होते रहते हैं । ऐसे मनुष्यों का नरदेह ऐसे व्यर्थ ही चला जाता है । क्योंकि ज्ञान के बिना किसीका भी मोक्ष नहीं हो सकता है ।
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वे सकाम कर्माभिमानी पुरुष सत्पुरुषों का संग भी नहीं करते । बिना संग के भगवत्प्राप्ति का उपाय भी उन्हें नहीं मिलता । वे आन्तरसाधना के बिना केवल पत्रपुष्पादिकों से उन देवताओं की अर्चना करते हैं । कभी-कभी गांव को छोड़कर वनों में निवास करते हैं । कामनाओं को लेकर नाना ब्रतानुष्ठान करते हैं । पंचाग्नि तप तपते हैं । तीर्थों में जाते रहते हैं ।
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अग्नि में अपने शरीर को जलाते हैं । परन्तु ज्ञानशून्य ऐसे साधनों से भगवान् की प्राप्ति नहीं होती । वे केवल अपनी आत्मा को क्लेश ही देते हैं । सद्गुरु के बिना उनका संशय भी निवृत्त नहीं होता न कर्मबन्धन ही कटते । अतः जो अनन्य भावना से पतिव्रता नारी की तरह परमात्मा की अभेदोपासना करता है तब उसी को साक्षात्कार होता है न कि भेदोपासना करने वालों को ।
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श्रीमद्भागवत में लिखा है कि –
जिस प्रकार वृक्ष की जड़ में पानी देने से उसके तना शाखा उपशाखा आदि का पोषण स्वयं ही हो जाता है ऐसे ही प्राणों को भोजन देने से समस्त इन्द्रियां पुष्ट हो जाती हैं उसी तरह भगवान् की पूजा से ही सब की पूजा हो जाती है । गीता में कहा है कि अल्पबुद्धि वाले जो देवताओं की उपासना करते हैं उनको नाशवान् फल मिलता है ।
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देवपूजक देवलोक में जाते हैं मेरी उपासना करने वाले मेरे लोक में जाते हैं । लोग करोड़ों यज्ञ करते हैं, गंगास्नान के लिये गंगाजी जाते हैं । परन्तु यह सार्वभौम सिद्धांत है कि ज्ञानहीन को मुक्ति नहीं मिल सकती है । चाहे गंगा सागर जावो चाहे ब्रतों का पालन करो अथवा दान करो । परन्तु इन सब साधनों से सो जन्म में अज्ञान के बिना मुक्ति नहीं हो सकती ।
(क्रमशः)

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