बुधवार, 14 जून 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १६०*

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*दादू जहाँ रहूँ तहँ राम सौं, भावै कंदलि जाइ ।*
*भावै गिरि परवत रहूँ, भावै गृह बसाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग विलावत १२, (गायन समय प्रातः ६ से ९)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१६० विनय । त्रिताल
हेरत१ हूं हरि नाम तुम्हारो ।
दीन दयाल दया कर दीजे, 
संतन जीवन प्राण अधारो ॥टेक॥
जीवन दिन जिव कैसे जीवै, 
ज्यों पानी बिन मीन विचारो ।
चातक चिन्त२ रही घन वर्षा, 
तृषावन्त३ पीव पिव पुकारो ॥१॥
कारज कहा४ सरै कहु कैसे, 
जे पीव हि नहिं स्वाति सहारो ।
मन मोती कैसे कर निपजे, 
घन समुद्र अति आहि५ पसारो६ ॥२॥
बालक दूध वेगि नहिं पावे, 
देही दग्ध होत सु प्रहारो७ ।
जन रज्जब कैसे करि जीवै, 
नाम बिना यह हाल हमारो ॥३॥८॥
निरंतर निज नाम स्मरण प्राप्ति के लिये विनय कर रहे हैं -
✦ हरे ! मैं आपके निज नाम के निरंतर स्मरण का साधन खोज१ रहा हूँ । दीन दयालो ! दया करके संतों का जीवन रूप और मेरे प्राणों का आधार रूप अपना निज नाम का निरंतर स्मरण मुझे प्रदान करें ।
✦ जैसे जल बिना मछली जीवित नहीं रह सकती, वैसे ही विचार करो, जीवन बिना जीव कैसे जीवित रहेगा ? चातक पक्षी के मन में बादल वर्षा का चिन्तन२ रहता है, वह प्यासा३ पक्षी पीव पीव पुकारता रहता है । वैसे ही मैं निज नाम के निरंतर स्मयण के लिये पुकार रहा हूं ।
✦ यदि सीप को स्वाति बिंदु का सहारा न मिले तो कहो, उसका क्या४ कार्य सिद्ध होगा ? और कैसे होगा ? बादल और समुद्र का जल विस्तार६ तो बहुत अधिक है५ किंतु स्वाति बिना मोती किस प्रकार उत्पन्न होगा ? वैसे तो नाम तो बहुत हैं किंतु निज नाम के निरंतर स्मरण बिना मन कैसे श्रेष्ठ होगा ?
✦ यदि माता बच्चे को समय पर शिघ्र दूध न पिलाये तो, उसकी जठराग्नि उसके शरीर को जलायेगी और शरीर पर कमजोरी का भारी आधात७ होगा । आपके नीज नाम के निरंतर स्मरण बिना वैसी ही दशा हमारी है । कहिये प्रभो ! हम किस प्रकार जीवित रहेंगे ?
(क्रमशः)

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