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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३४२)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
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*३४२. गजताल*
*सोई राम सँभाल जियरा, प्राण पिंड जिन दीन्हा रे ।*
*अम्बर आप उपावनहारा, मांहि चित्र जिन कीन्हा रे ॥टेक॥*
*चंद सूर जिन किये चिराका, चरणों बिना चलावै रे ।*
*इक शीतल इक तारा डोलै, अनन्त कला दिखलावै रे ॥१॥*
*धरती धरनि वरन बहु वाणी, रचिले सप्त समंदा रे ।*
*जल थल जीव सँभालनहारा, पूर रह्या सब संगा रे ॥२॥*
*प्रकट पवन पानी जिन कीन्हा, वरषावै बहु धारा रे ।*
*अठारह भार वृक्ष बहु विधि के, सबका सींचनहारा रे ॥३॥*
*पँच तत्त्व जिन किये पसारा, सब करि देखन लागा रे ।*
*निश्चल राम जपो मेरे जियरा, दादू तातैं जागा रे ॥४॥*
हे मन ! जिस परमात्मा ने शरीर रचा, तथा उसमें प्राणों का संचार किया तूं उस भगवान् को भज । जिसने विचित्र आकाश को बनाया । उसमें चन्द्रमा और सूर्य दो दीपक बनाये हैं । चन्द्रमा अपने शीतल किरणों से तथा सूर्य उष्ण किरणों से जगत् की सेवा करते हुए इस महाकाश में घूम रहे हैं । इसी तरह महाकाश में अनन्तज्योतिगण उस परमात्मा की महिमा को प्रकाशित कर रहे हैं ।
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अनेक रंग-बिरंगी विशाल पृथिवी को बनाया सात समुद्र तथा जल स्थल आकाश में अनन्त जीवों को पैदा किया तथा अनन्त वर्षा की धारा को वर्षाता है । अठारह भर वनस्पतियों को बनाकर जल से उनका सिंचन करता है । पाँच तत्त्वों को बनाकर उनके द्वारा पाँच भूतों की रचना करके उन्हीं भूतों से सकल जगत् को बनाया सबको साक्षिभाव से देखता रहता है । उसी नारायण भगवान् का तूं भजन कर । जितने भी प्रबुद्ध ज्ञानी पुरुष हुए हैं वे सभी नाम साधना से ही जागे हैं ।
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कठोपनिषद् में लिखा है कि –
जिस परमात्मा से सूर्य प्रकट होता है और उसी में विलीन हो जाता है और उसी में सभी देवता प्रविष्ट हैं । उस परमेश्वर की महिमा को कोई नहीं जान सकता और उसकी व्यवस्था का उल्लंघन कोई नहीं कर सकता है ।
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उस परमेश्वर से प्राण उत्पन्न होता है तथा अन्तःकरण समस्त इन्द्रियां आकाश वायु तेज जल और विश्व को धारण करने वाली पृथिवी उत्पन्न हुई । उसी से अग्नि जिसकी समिधा(इन्धन) सूर्य है । अग्नि से सोम, सोम से मेघ और मेघों से वर्षा द्वारा पृथिवी में औषधीयें उत्पन्न हुई । उनके खाने से जो वीर्य उत्पन्न होता है । उसका पुरुष स्त्री में सिंचन करता है जिससे सन्तान उत्पन्न होती है ।
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इसी प्रकार उस पुरुष से ही नाना प्रकार के जीव उत्पन्न हुए । उसी से समुद्र पर्वत उत्पन्न हुए । इन्हीं से अनेक प्रकार की नदियाँ निकल कर बह रही है । इसी से औषधियों का रस उत्पन्न हुआ है । जिस रस से पुष्ट हुए शरीर में यह अन्तरात्मा परमेश्वर प्राणियों की आत्मा के सहित उनके हृदय में स्थित हैं । अतः हे मन ऐसे प्रभु का भजन कर ।
(क्रमशः)

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