गुरुवार, 22 जून 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १६३*

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*ऐसा अवसर बहुरि न तेरा,*
*देख विचार समझ जिय मेरा ।*
*दादू हार जीत जग आया,*
*बहुत भांति कह-कह समझाया ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ३८४)
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग सोरठ १३ (गायन ९ से १२ रात्रि वा वर्षा ॠतु)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१६३ मनोपदेश । त्रिताल
मन रे राम न सुमर्यो भाई, जो सब संतन सुखदाई ॥टेक॥
पल पल घड़ी पहर निशि वासर१, लेखे में जो जाई ।
अजहुं अचेत२ नैन नहिं खोलत, आयु अवधि सो आई ॥१॥
वार पक्ष वर्ष बहु बीते, कहि धौं३ कहा कमाई ।
कहत हि कहत कछू नहिं समझत, गति४ एको नहिं पाई ॥२॥
जन्म जीव हार्यों५ सब हरि बिन, कहिये कहा बनाई ।
जन रज्जब जगदीश भजे बिन, दस दिशि सौंज६ गमाई ॥३॥१॥
मनको उपदेश कर रहै हैं -
✦ अरे भैया मन ! जो सब संतों को सुख दाता हैं, उन राम का स्मरण तूने नहीं किया,
✦ प्रत्येक क्षण घड़ी, पहर, रात्रि, दिन१ तेरे व्यर्थ ही जा रहे हैं, सो सब तेरे जीवन के हिसाब में आयेंगे । तुझे पूछा जायेगा कि - तूने यह व्यर्थ क्यो खोये । अरे असावधान ! अब भी तू अपने विचार नेत्र नहीं खोलता । मोह निन्द्रा में सोया पड़ा है । तेरी आयु की जो अवधि है, सो भी समीप आ गई है ।
✦ बहुत वार, पक्ष और वर्ष व्यतित हो गये हैं कह तो सही३ तूने क्या कमाया है ? बारंबार कहने पर भी तू नहीं समझता । तेरी एक भी चेष्टा४ का ठीक पता नहीं मिलता है तू क्या करना चाहता है ?
✦ तूने हरि चिंतन बिना मुझ जीव का मनुष्य जन्म व्यर्थ ही खो५ दिया है । इससे अधिक क्या बात बनाकर कहैं, तूने जगदीश्वर का भजन करे बिना ही दश इन्द्रियों के विषय रूप दश दिशाओं में मनुष्य शरीर रूप सामग्री६ खो दी है ।
(क्रमशः)

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