गुरुवार, 22 जून 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #३४५

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३४५)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
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*३४५. सांच निदान । राज मृगांक ताल*
*हरि बिन निहचल कहीं न देखूं, तीन लोक फिरि सोधा रे ।*
*जे दीसै सो विनश जायगा, ऐसा गुरु परमोधा रे ॥टेक॥*
*धरती गगन पवन अरु पानी, चंद सूर थिर नाँहीं हीं रे ।*
*रैनि दिवस रहत नहिं दीसै, एक रहै कलि मांहीं रे ॥१॥*
*पीर पैगम्बर शेख मुशायख, शिव विरंचि सब देवा रे ।*
*कलि आया सो कोई न रहसी, रहसी अलख अभेवा रे ॥२॥*
*सवा लाख मेरु गिरि पर्वत, समंद न रहसी थीरा रे ।*
*नदी निवान कछू नहिं दीसै, रहसी अकल शरीरा रे ॥३॥*
*अविनाशी वह एक रहेगा, जिन यहु सब कुछ कीन्हा रे ।*
*दादू जाता सब जग देखूं, एक रहत सो चीन्हा रे ॥४॥*
त्रिभुवन में परिभ्रमण करके मैंने जान लिया कि हरि के बिना कोई भी इस जगत् में निश्चल नहीं है । क्योंकि सारा दृश्य प्रपंच नष्ट होने वाला है । ऐसा ही मेरे गुरु ने उपदेश दिया है । पृथिव्यादि पञ्चमहाभूत सूर्य चन्द्रमा दिन रात इनमें कोई भी स्थिर रहने वाला नहीं है । केवल ब्रह्म ही शाश्वत हैं ।
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पीर पैग़म्बर शेख आदि धर्म के जानने वाले तथा शिव ब्रह्मा देवी देवता सभी नष्ट हो जाते हैं । क्योंकि जो पैदा होता है वह अवश्य नष्ट हो जाते है ऐसा ही ध्रुव सत्य है । जो सुमेरु आदि सवा लाख पर्वत स्थिर दीखते हैं वे भी नष्ट हो जाते हैं ।
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समुद्र नदी तालाब आदि जलाशय भी स्थिर रहने वाले नहीं हैं । जिस ब्रह्म ने इस सारे विश्व को रचा है वह ही फलातीत कालातीत शाश्वत है क्योंकि अविनाशी होने से उसी अद्वैत ब्रह्म का निजात्म रूप से मैंने साक्षात्कार किया है ।
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गीता में भी कहा है कि –
हे अर्जुन नाश रहित तो तूं उसको जान जिससे यह संपूर्ण दृश्य व्याप्त है । इस अविनाशी का नाश करने में कोई समर्थ नहीं है । उपनिषद् में भी कहा है कि यह आत्मा अविनाशी है और अनुच्छित्ति धर्म वाला है ।
(क्रमशः)

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