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*जे सांई का ह्वै रहै, सांई तिसका होइ ।*
*दादू दूजी बात सब, भेष न पावै कोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग विलावत १२, (गायन समय प्रातः ६ से ९)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१६२ भक्ति जाति न देखे । धीमा त्रिताल
भक्ति जाति को क्या करै, सुनियो रे भाई ।
बेटी सारे१ बाप के, भेजै तहँ जाई ॥टेक॥
नाम कबीर सु कौन थे, कुण रांका बाका ।
भक्ति समानी२ सब घर हु, तज कुल का नाका३ ॥१॥
लघु कुल द्योगू दीप थे, कीता सु कणेरी ।
भक्ति भेद राख्या नहीं, तिन के घर चेरी ॥२॥
विदुर बांदरा४ वंश थे, सौ भक्ति न छोड़ै ।
नीच ऊंच देखे नहीं, मन माने मोड़ै५ ॥३॥
आदि मिली जैदेव को, रैदास समाणी६ ।
सो दादू घर पैठतों, क्यों रहे निमाणी७ ॥४॥
रज्जब रोकी ना रहे, आज्ञा ले आई ।
राव रंक सम भक्ति के, भव धार्यों पाई ॥५॥१०॥
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भक्ति जाति को नहीं देखती, यह कह रहे हैं -
✦ हे भाईयो ! सुनो भक्ति जाति को देखकर क्या करेगी ? वह तो जैसे बेटी पिता के आश्रय१ है, भगवान भेजते हैं वहां ही जाती है ।
✦ नामदेव कौन थै, छींपा । और कबीर कौन थे ? जुलाहा । रांका बांका कौन थे ? कुम्हार । किंतु भक्ति कुल को देखकर उक्त सभी के हृदय रूप घर में प्रवेश२ करके रही है,
✦ द्योगु मीणा थे । दीपू कायस्थ थे । कीता कनेरी थे । ये सब छोटे कुल के ही थे । किंतु भक्ति ने कुल का भेद नहीं रखा३, उनके घर दासी के समान सदा स्थिर रही है ।
✦ विदुर दासों४ के वंश में थे, उनको भी भक्ति ने नहीं छोड़ा । भक्ति ऊंच नीच नहीं देखती है भक्त के द्वा५र पर ही उसका मन संतोष मानता है ।
✦ आदि ब्राह्यण जाति के जयदेव भक्त को प्राप्त हुई और अंतिम चमार जाति के रैदास के हृदय में भी प्रवेश६ करके रही वह दादू के हृदय घर में प्रवेश करके निम्न७ कैसै रह सकती है ?
✦ भक्ति भगवान की आज्ञा लेकर आई है । वह किसीके रोकने से नहीं रुकती । भक्ति के राजा रंक दोनों समान हैं । जिनने भगवान सम्बन्धी श्रद्धा भाव हृदय में धारण किया है, उन्होंने ही भक्ति प्राप्त की है, वे चाहे कोई भी हों ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित विलावत राग १२ समाप्तः ।
(क्रमशः)

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