मंगलवार, 27 जून 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १६५*

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*हिरदै की हरि लेइगा, अंतरजामी राइ ।*
*साच पियारा राम को, कोटिक करि दिखलाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग सोरठ १३ (गायन ९ से १२ रात्रि वा वर्षा ॠतु)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१६५ प्रभु सर्वज्ञता । तिलवाड़ा
मेरो नाह१ निकुल२ निज ज्ञानी हो,
कहा करूं कछु कहत न आवे, प्रगट गुप्त नहिं छानी३ हो ॥टेक॥
अंतर्यामी अंदर देखे, ता सौं कहा दुरानी४ हो ।
वक्त्र५ बनाय कहै बिच औरै, या परि अर्ज न मानी हो ॥१॥
सर्वंगी समझै सब ठाहर, जो नख शिख मन सानी६ हो ।
न्याय नीति वा७ सम को नांही, छाने८ दूध रु पानी हो ॥२॥
सूधी९ सुरति१० न साँची उपजी, दिल सौं दिल न ठरानी११ हो ।
रज्जब रुचि१२ भरि कैसे पावै, गति१३ गोविन्द नहिं जानी हो ॥३॥३॥
प्रभु की सर्वज्ञता दिखा रहे हैं -
✦ हमारे प्रभु१ किसी के वश में नहीं है इससे अकुल२ हैं । किसी दूसरे के उपदेश से ज्ञानी नहीं हुये हैं, इसलिये निज ज्ञानी है । उनके विषय में क्या कहूं, कुछ कहा नहीं जाता, संसार की प्रकट और गुप्त दोनों ही बातें उनसे छिपती३ नहीं हैं, वे सर्वज्ञ हैं, सब जानते हैं ।
✦ वे अंतरयामी भीतर ही सब देख लेते हैं, उनसे क्या बात छिपाई४ जा सकती है ? भीतर तो दूसरी बात हो और मुख५ से दूसरी बना कर कहें, तब इस चालाकी से वे प्रार्थना करने पर भी नहीं मानते ।
✦ वे तो सर्व रूप हैं । वे सब स्थानों में रहते हुये जो नख से शिखा तक तथा मन में मिली६ हैं उन सब भावनाओं को समझते हैं । उनके७ समान न्याय नीति में निपुण कोई भी नहीं है, वे तो दूध और पानी को अलग८ अलग करने वाले हैं ।
✦ जिसकी वृत्ति९ सरल१० नहीं है, जिसमें सच्ची प्रीति उत्पन्न नहीं हुई है, जिसके हृदय की भावना से दूसरे का हृदय शीतल११ नहीं होता और जिसने गोविन्द की चेष्टा१३ को नहीं जाना है, वह इच्छा१२ भर कर प्रभु को कैसे प्राप्त कर सकता है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित सोरठ राग १३ समाप्तः ।
(क्रमशः)

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