मंगलवार, 27 जून 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #३४७

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३४७)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
===========
*३४७. साधु परीक्षा । दादरा*
*सोई साधु शिरोमणि, गोविंद गुण गावै ।*
*राम भजै विषिया तजै, आपा न जनावै ॥टेक॥*
*मिथ्या मुख बोलै नहीं, पर निंदा नाँहीं हीं ।*
*औगुण छाड़ै गुण गहै, मन हरि पद मांहीं ॥१॥*
*निर्वैरी सब आतमा, पर आतम जानै ।*
*सुखदाई समता गहै, आपा नहीं आनै ॥२॥*
*आपा पर अंतर नहीं, निर्मल निज सारा ।*
*सतवादी साचा कहै, लै लीन विचारा ॥३॥*
*निर्भय भज न्यारा रहै, काहू लिप्त न होई ।*
*दादू सब संसार में, ऐसा जन कोई ॥४॥*
.
जो साधु भगवान् के गुणानुवाद गाता है । विषयों की आसक्ति को छोड़कर भगवान् का भजन करता है । किसी प्रकार का अभिमान नहीं करता मिथ्या नहीं बोलता । निन्दा नहीं करता । दूसरे के अवगुणों को त्यागकर गुण ही ग्रहण करता है । जिस का मन प्रभु भक्ति में लगा हुआ है । किसी से वैरभाव नहीं रखता । दूसरों को भी अपने समान ही समझता है ।
.
सबको सुख देने वाली समत्व बुद्धि को धारण करता है । अपना पराया जिसके मन में भेद नहीं हैं तथा सबको परमात्मरूप से ही देखता है । सत्य बोलना और सत्य ब्रह्म का सच्चा उपदेश करना । जिसका मन सतत ब्रह्म में ही लीन रहता हो । निर्भय हो, तथा वैराग्यवान् होकर भगवान् को भजता है । सबसे निर्लिप्त रहता हो । ऐसा साधु भक्त सब भक्तों में शिरोमणि माना गया है । परन्तु ऐसे भक्त विरले ही होते हैं ।
.
श्रीमद्भागवत में –
महापुरुष वे ही कहलाते हैं जो समचित्त परमशान्त क्रोधहीन सबके हितचिन्तक और सदाचारसंपन्न हो । श्रीभागवत के ११ स्क. अ. २ –
भगवान् समस्त प्राणियों में आत्मरूप से स्थित हैं । जो कहीं भी न्यूनाधिकता न देखकर सर्वत्र परिपूर्ण भगवत्सत्ता को ही देखता है और साथ ही समस्त प्राणी और समस्त पदार्थ आत्मस्वरूप भगवान् में अध्यस्त रूप से स्थित है । ऐसा जिसका अनुभव है वह भगवान् का परम प्रेमी उत्तम भक्त है । जो इन्द्रियों के द्वारा शब्द स्पर्श रूप आदि विषयों को ग्रहण करता है ।
किन्तु अपनी इच्छा के विपरीत विषयों से द्वेष नहीं करता तथा अनुकूल विषयों के मिलने पर हर्षित नहीं होता । उसकी यह दृष्टि बनी रहती है कि यह सब भगवान् की माया है । ऐसे भाव वाला उत्तम सन्त हैं । जो धन सम्पत्ति अथवा शरीर आदि में यह अपना है और यह पराया है ऐसा भेद नहीं रखता । समस्त पदार्थों में सम स्वरूप परमात्मा को देखता है । समभाव रखता है । किसी घटना से या संकट में विक्षिप्त नहीं होता किन्तु शांत रहता है । वह उत्तम भक्त है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें