बुधवार, 28 जून 2023

*६. अलिभगवान् जी की पद्य टीका*

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*दादू नारायण नैना बसै, मनही मोहन राइ ।*
*हिरदा मांही हरि बसै, आतम एक समाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*६. अलिभगवान् जी की पद्य टीका*
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*रामहि पूज अलीभगवान्,*
*वृन्दावन आय रु और भई है ।*
*रास विलास निहार विहार हिं,*
*प्यास बढ़ी रस राशि नई है ।*
*चाह सु रासविहारि हि पूजन,*
*बात सुनी गुरु रीति गई है ।*
*आत भये वन जाय परे पग,*
*ईश तुम शिर के सु दिई है ॥३४७॥*
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अलिभगवान् को उनके गुरुजी ने राममंत्र दिया था और श्रीरामजी की ही सेवा पूजा सदा आप सावधानी से करते थे । किन्तु वृन्दावन में आने पर उनकी दशा दूसरी ही हो गई...
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अर्थात् रास के प्रेमी हो गये और रास-विलास देखकर रस-राशि विहारी जी श्रीकृष्ण के दर्शन की नूतन अभिलाषा उनको बहुत बढ़ गई । अब उनके मन में रासविहारी जी का पूजन करने की इच्छा रहती थी ।
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इनकी यह बात कि - गुरुजी की बताई हुई उपासना की रीति तो उनके हृदय से चली गई है, और अब वे श्रीकृष्ण जी के भक्त बन गये हैं, सुनकर गुरुजी वृन्दावन में आये तब...
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अलिभगवान् उनके पास जाकर तथा चरणों में सिर रख विनय करने लगे- "यद्यपि आप गुरु ईश्वर रूप हैं और आपका उपदेश मेरे शिर पर है तथापि अब मेरा मन रासबिहारी की उपासना में आनन्द मानता है । अलिभगवान् की उक्त बात सुनकर गुरुजी ने कह दिया कि- "रासविहारी जी भी तो रामजी के ही अवतार हैं, रासविहारी को ही भजा करो, इससे कुछ हानि नहीं है ।"
(क्रमशः)

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