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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३७. निगुणां कौ अंग ५/८*
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निगुणां नीलज्ज नांऊं तजि, कहै कथा कछु आंन ।
जगजीवन जे सुणत हैं, फूटौ तिनका कांन ॥५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि निगुणा जीव जो प्रभु कृपा नहीं मानते वे स्मरण छोड़कर और ही विषयक कहते रहते हैं और जो उनकी बात सुनते हैं वे भी पाप के भागीदार होते हैं संत कहते हैं कि उनके तो कान ही फूटजाने चाहिए ।
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जे गुरु कह्या सो नां करै, करै पराई बात ।
कहि जगजीवन भ्रमै नर, रांम बिमुख दिन रात ॥६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो गुरु का कहा न करे और दूसरी बात ही करते रहे संत कहते हैं कि वे नर भ्रमित हो प्रभु विमुख हो दिन रात डोलते रहते हैं ।
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निगुणांहरि गुण गमावै, औगुण अंग सुहाइ ।
कहि जगजीवन जगतगुरु, रांम न परसै ताहि ॥७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि निगुणा जीव गुणों को नष्टकर अवगुणों को अपनाता है संत कहते हैं ऐसै जीव को प्रभु कभी नहीं अपनाते ।
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कहि जगजीवन रांमजी, मूरख मिलै न बाग ।
लुबधि१ लाय२ लागी रहै, अंदर परलै आग३ ॥८॥
(१. लुबधि=लुब्धि, लोभ) (२. लाय=अग्नि) (३.परलै आग=प्रलय अग्नि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मूरख को कभी भी कृपा नहीं दिखती वह लोभ की अग्नि में जलता हुआ प्रलय अग्नि में दग्ध होता है ।
(क्रमशः)

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