🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*साधु मिलै तब ऊपजै, हिरदै हरि का भाव ।*
*दादू संगति साधु की, जब हरि करै पसाव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
==========
*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
.
*रसिक मुरारि जी*
.
*छप्पय-*
*राघव रसिक मुरारि धनि, अति प्रबोध पूरव कीयो ॥*
*राजा खल खंडैत१, दिक्षित२ करि कर्म छुड़ाया ।*
*भाव भक्ति पण थप्यो, भरम गहि अधर उड़ाया ।*
*तन मन धन सर्वस्व, अरपि साधन को दीजे ।*
*मनुष जन्म फल येह, देह धर लाहा लीजे ॥*
*करहि कीरतन रैनि दिन, प्रेम प्रीति उमगे हीयो ।*
*राघव रसिक मुरारि धनि, अति प्रबोध पूरव कीयो ॥२६३॥*
.
रसिक मुरारी जी को धन्यवाद है । आपने पूर्व देश के लोगों को अत्यधिक उपदेश किया था । एक दुष्ट स्वभाव वाला राजा धर्म मर्यादा को भंग१ करने में तत्पर था । उसको उपदेश२ देकर आपने उसका कुकर्म छुड़ाया था और प्रतिज्ञापूर्वक उसमें भाव-भक्ति की स्थापना की थी ।
.
उसके हृदय के भ्रम को अपने उपदेश रूप हाथ से पकड़कर अधर उठाकर उड़ा दिया था अर्थात् उसके हृदय में भ्रम नहीं रहने दिया था । आप अपना तन, मन, धन आदि सर्वस्व प्रभु के समर्पण करके संतों को ही देते थे अर्थात् सब संत सेवा में ही लगाते थे और कहते थे ....
.
मनुष्य जन्म का फल यह संत सेवा ही है । अतः मनुष्य देह धारण करके यह लाभ अवश्य लेना चाहिये । आप रात्रि दिन प्रभु के नामों का कीर्तन करते थे । प्रभु प्रेम और संतों की प्रीति से आपके हृदय में आनन्द की उमंग उठती रहती थी ॥२६३॥
(क्रमशः)
.jpg)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें