गुरुवार, 13 जुलाई 2023

*३७. निगुणां कौ अंग २५/२८*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३७. निगुणां कौ अंग २५/२८*
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भाहि९ लगी भीतरि धसै१०, भाव भगति क्यों होइ ।
कहि जगजीवन हरि भगत, दीन गरीबी जोइ ॥२५॥
(९. भाहि=अग्नि) (१०. धसै=अन्तः प्रविष्ट हो जाय)
संतजगजीवन जी कहते हैं अन्तर में विषयी अग्नि प्रज्वलित होते हैं तो भाव भक्ति कैसे हो ? जो प्रभु के भक्त हैं वे तो विनम्र व दीन भिव रखते हैं ।
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मन मांहै जे रांम क्रित, कोई समझै नांहि ।
कहि जगजीवन देह चेष्टा, देखि बसी चित मांहि ॥२६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मन में राम संकीर्तन है जो कोइ नहीं जान सकता जो उपरी देह के क्रियाकलाप है वे ही सबको दिखते हैं ।
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कहि जगजीवन गालि११ दे, गली गली के बीच ।
भगति प्रेम रस रांम गुंन, नाउं न समझै नीच ॥२७॥
(११. गाली=अपशब्द)
संतजगजीवन जी अधम व्यक्ति की प्रकृति बताते हुये कह रहे हैं कि वह अपशब्द तो वह सरेराह कहता किंतु भक्ति प्रेम भाव इन उत्कृष्ट मूल्यों को नहीं जानता है ।
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गुणवंत सेती गुण१ किया, सहस गुणी गुण वृधि२ ।
कहि जगजीवन हरि भगत, रिधि३ मैं पावै सिधि ॥२८॥
(१. गुण=उपकार) (२. वृधि=वृद्धि) {३. रिधि=ऋद्धि(आर्थिक सम्पन्नता)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि गुणीजन ने गुण अपनाये उसमें सहस्त्रगुणा वृद्धि हुई । संत कहते हैं कि हरि भक्त आर्थिक सम्पन्नता व सिद्धि सब भक्ति में ही पा लेते हैं ।
(क्रमशः)

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