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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू जब घट अनुभै उपजै, तब किया कर्म का नाश ।*
*भय अरु भ्रम भागे सबै, पूरण ब्रह्म प्रकाश ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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श्रीरामकृष्ण - अच्छा, तुम्हें विचार प्यारा है, तो सुनो कुछ विचार करता हूँ । ज्ञानी के मत से अवतार नहीं है । कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, ‘तुम मुझे अवतार-अवतार कह रहे हो, आओ, तुम्हें एक दृश्य दिखलाऊँ ।’ अर्जुन साथ-साथ गये । कुछ दूर जाने पर कृष्ण ने पूछा, ‘क्या देखते हो ?’
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अर्जुन ने कहा, ‘एक बहुत बड़ा पेड़ है और उसमें गुच्छे के गुच्छे जामुन लटक रहे हैं ।’ कृष्ण ने कहा, ‘वे जामुन नहीं हैं । जरा और बढ़कर देखो ।’ तब अर्जुन ने देखा, गुच्छों में कृष्ण फले हुए थे । कृष्ण ने कहा, ‘अब देखा ? - मेरी तरह कितने कृष्ण फले हुए हैं !”
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"कबीरदास ने कृष्ण की बात पर कहा था, ‘वह तो गोपियों की तालियों पर बन्दर-नाच नाचा था !’
"जितना ही बढ़ जाओगे, ईश्वर की उपाधि उतनी ही कम देखोगे । भक्त को पहले दशभुजा के दर्शन हुए । और भी बढ़कर उसने देखा, षड़भुजा मूर्ति । और भी बढ़कर देखा, द्विभुज गोपाल । जितना ही बढ़ रहा है, उतना ही ऐश्वर्य घट रहा है । और भी बढ़ा तब ज्योति के दर्शन हुए - कोई उपाधि नहीं ।
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“जरा वेदान्त का भी विचार सुनो । किसी राजा को एक आदमी इन्द्रजाल दिखाने के लिए आया था । उसके जरा हट जाने पर राजा ने देखा, एक सवार आ रहा है – घोड़े पर बड़े रोब-दाब से, हाथ में अस्त्र-शस्त्र लिये हुए । सभा भर के आदमी और राजा विचार करने लगे कि इसके भीतर क्या सत्य है । वह घोड़ा तो सत्य नहीं है, वह साज-बाज सत्य नहीं है, वे अस्त्र-शस्त्र भी सत्य नहीं हैं । अन्त में सचमुच देखा, सवार ही अकेला खड़ा था और कुछ नहीं । अर्थात् ब्रह्म सत्य है, संसार मिथ्या । विचार करना चाहो तो फिर और कोई चीज नहीं टिकती ।”
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डाक्टर - इसमें मेरी ओर से कोई आपत्ति नहीं ।
श्रीरामकृष्ण परन्तु यह भ्रम सहज ही दूर नहीं होता । ज्ञान के बाद भी कुछ कुछ रहता है । स्वप्न में अगर कोई बाघ देखता है तो आँख खुलने के बाद भी छाती धड़कती रहती है ।
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“चोर खेत में चोरी करने के लिए गये हुए थे । वहाँ आदमी के आकार का पुतला बनाकर खड़ा कर दिया गया था, डरवाने के लिए । चोर मारे डर के घुस नहीं रहे थे । एक ने पास जाकर देखा तो केवल घास ! - आदमी के शक्ल की बाँधकर खड़ी कर दी गयी थी ।
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उसने वहाँ से आकर अपने साथियों से कहा कि डरने की कोई बात नहीं । किन्तु फिर भी वे लोग मारे डर के कदम आगे नहीं बढ़ा रहे थे । कहते थे, ‘छाती धड़कती है ।’ तब जिसने पास जाकर देखा था, उसने उस गड़े हुए आकार को जमीन में सुला दिया और - कहने लगा, ‘यह कुछ नहीं है, यह कुछ नहीं हैं’ – ‘नेति’ ‘नेति’ ।”
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डाक्टर - यह तो बड़ी सुन्दर बात है !
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - हाँ, कैसी बात है ?
डाक्टर - बड़ी सुन्दर है ।
श्रीरामकृष्ण - एक बार थैन्क यू(Thank you) भी तो कहो ।
डाक्टर - क्या आप मेरे मन का भाव नहीं समझ रहे हैं ? इतना कष्ट करके आपको यहाँ देखने के लिए आता हूँ !
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श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - नहीं जी, मूर्ख के कल्याण के लिए भी तो कुछ कहो । विभीषण ने लंका का राजा होना अस्वीकृत कर दिया था, कहा था, ‘राम, मैं तुम्हें जब पा गया तो अब राज्य से क्या काम ?’ राम ने कहा, "विभीषण, तुम मूर्खों के लिए राजा बनो । जो लोग कह रहे हैं, ‘तुमने राम की इतनी सेवा की, परन्तु तुम्हें ऐश्वर्य क्या मिला ?’- उनकी शिक्षा के लिए तुम राजा बनो ।”
डाक्टर - यहाँ उस तरह का मूर्ख है कौन ?
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - नहीं जी, यहाँ शंख भी है और शम्बुक भी हैं ! (सब हँसते हैं)
(क्रमशः)

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