बुधवार, 12 जुलाई 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १७१*

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*हरि के चरण पकर मन मेरा,*
*यहु अविनाशी घर तेरा ॥*
*जब चरण कमल रज पावै,*
*तब काल व्याल बौरावै ।*
*तब त्रिविध ताप तन नाशै,*
*तब सुख की राशि विलासै ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. १८२)
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग कान्हड़ा १५ (गायन समय रात्रि १२ से ३)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१७१ प्रभु मिलन उत्कंठा । दादरा
कब हूं देखि हूँ हरि चरण,
मन कर्म वचन जाउं बलिहारी, जो पाऊं शिर धरन१ ॥टेक॥
सारंग२ भई सकल तज सजनी, नाम रटन उर करन३ ।
तन मन सकल करूं नौछावर,जो आवें पति घरन ॥१॥
सुरति सीप सायर५ सब त्यागे, नाम स्वाति ता शरन ।
जन रज्जब की विपति दूर करि, आय मिलो दुख हरन ॥२॥२॥
प्रभु के मिलन की तीव्र इच्छा प्रकट कर रहे हैं -
✦ मैं हरि के चरण कमलों को कब देखुंगा ? यदि मैं हरि चरणों में अपना शिर धर१ पाऊंगी तो तन वचन कर्म से उनकी बलिहारी जाऊंगी ।
✦ संत - सजनी ! मैं तो सब कुछ त्याग कर चातक२ बन गई हूँ, जैसे चातक पक्षी पीव पीव रटता रहता है, वैसे ही मैं प्रभु के नाम का रटन हृदय में करती हूँ । यदि मेरे प्रभु मेरे हृदय घर में पधार जाँय तो मैं उन पर तन मन और सर्वस्व नौयाछावर कर दूंगी ।
✦ जैसे सीप समुद्र५ को त्यागकर स्वाति को ग्रहण करती है, वैसे ही मैंने सबको त्याग दिया है, और नाम चिन्तन करते हुये उन प्रभु की ही शरण हूं । हे दु:खहर्ता प्रभो ! मेरे हृदय में आकर मुझ से मिलें और मेरी विपत्ति दूर करें ।
(क्रमशः)

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