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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*राम विमुख जुग जुग दुखी, लख चौरासी जीव ।*
*जामै मरै जग आवटै, राखणहारा पीव ॥*
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*हरि बिमुख भुलावणि कौ अंग ॥*
बषनां बहुत बर नसिया, जे हरि बीसरिया ।
ते भरिया संसार मैं, रीता नीसरिया ॥१॥
जो देवदुर्लभ मनुष्य जन्म को प्राप्त करके भी हरि = परमात्मा का विस्मरण कर देते हैं वे अनेक जन्मों को धारण कर-करके नष्ट होते रहते हैं । जो संसार में भरिया = आसक्त हो जाते हैं वे रामजी की भक्ति न करने के कारण यमलोक में रीते ही पहुँचते हैं । उनके पास बुरे कर्मों की तो गाँठ होती है किन्तु सुकृतों का लेश भी नहीं होता । परिणामस्वरूप उन्हें यमदण्ड भुगतने पड़ते हैं ॥१॥
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बषनां बहुत बर नसिया, ज्यांह बिसार्यो राम ।
ते आया ही अणआइया, सर्यौ न कोई काम ॥२॥
बषनांजी कहते हैं, जिन्होंने रामजी का विस्मरण किया है वे अनेकों जन्म धारण करते और मरते रहते हैं । वे इस संसार में जन्मते तो हैं किन्तु उनका जन्मना न जन्मने के समान है क्योंकि उनका एक भी कार्य पूर्ण नहीं होता है । अर्थात् न उनका लोक सुधरता है क्योंकि संसार में चिरकाल रहना संभव नहीं, एक न एक दिन मरना पड़ता है और न परलोक ही सुधरता है क्योंकि रामजी का भजन करके मोक्ष प्राप्त न की जिससे भले बुरे कर्मफलों को भोगने को पुनः पुनः संसार में आना पड़ता है ।
“ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ॥२॥”
इति हरि बिमुख भुलावणि कौ अंग संपूर्ण ॥अंग ३९॥साषी ६३॥
(क्रमशः)

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