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*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३९. बिनती कौ अंग ५/८*
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कहि जगजीवन दीन कौं, दरसन दीजै रांम ।
विरद प्रेम बैराग हरि, भाव भगति सब ठांम ॥५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु इस दीन को दर्शन दिखला दो । आपकी उदारता स्नेह वैराग्य भक्ति भाव सर्वत्र बना रहे ।
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कहि जगजीवन रांमजी, मनुष जनम जे दीन्ह ।
तो कुछ गति प्रव्रिति करौं, प्राण पिंड कर लीन्ह ॥६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे राम जी यदि मनुष्य जीवन दिया है तो प्राण पिण्ड जाने से पहले कुछ सार्थक प्रवृत्ति व गति प्रदान करें ।
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कहि जगजीवन रांमजी, नख सिख सकल सरीर ।
आप सरीखा कीजिये, अंग मंहि निहचल थीर६ ॥७॥
(६. थीर=थिर, स्थिर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे राम जी अंगों को स्थिर कर नख से शिख तक यानि सम्पूर्ण देह को आप जैसी करदे ।
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एक सबद आनंद का, रांम सुणावौ आइ ।
जामैं आनंद ऊपजै, जगजीवन थिति पाइ ॥८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु आप आनंद प्राप्ति हो ऐसा शब्द सुनायें व जीव स्थिर हो ।
(क्रमशः)

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