शनिवार, 1 जुलाई 2023

*७. महामुनि मधु गोस्वामी*

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*प्रेम मगन रस पाइये, भक्ति हेत रुचि भाव ।*
*विरह बेसास निज नाम सौं, देव दया कर आव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विरह का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*७. महामुनि मधु गोस्वामी*
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*श्री मधु आय वृन्दावन में इन,*
*नैननि से कब देख हुँ रूपं ।*
*हेरत है वन कुंज लता द्रुम,*
*भूख न प्यास गिणे नहिं धूपं ॥*
*काटत ही यमुना सु किरारनि१,*
*बंसि बटं तट देख अनूपं ।*
*दौरि लगे गरि२ आप भये जड़,*
*है अज हूं गोपिनाथ स्वरूपं ॥३५०॥*
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मधु गोस्वामी धामनिष्ठा के दृढ़ भक्त थे । आप बंगाल से वृन्दावन आये तब उनके मन में यह प्रबल इच्छा थी कि मैं अपने नेत्रों से श्रीकृष्ण का स्वरूप कब देख सकूंगा ? उनका रूप कैसा है ? देखने से संतोष होगा ।
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इस उत्कण्ठा से आप भूख, प्यास, छाया, धूप और नींद आदि को कुछ भी नहीं गिन के अर्थात् सब को भूल कर वन वन के प्रति कुञ्ज, लता और वृक्षों के बीच खोजते फिरते थे ।
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एक दिन वंशी बट के पास यमुना जी बढ़ी हुई किनारे१ काट रही थी । वहीं श्रीकृष्ण ने कृपा करके अनुपम रूप से मधुगोस्वामी को दर्शन दिया ।
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देखते ही मधुगोस्वामी दौड़कर आपके गले२ से लग गये अर्थात् अंक में भर कर अनिर्वाच्य परमानन्द को प्राप्त हुये । पीछे उस साक्षात् रूप से ही भगवान् जड़ मूर्ति रूप बन गये और "गोपीनाथ" रूप होकर अब तक भी वहाँ ही विराजते हैं । उनके दर्शन करके भक्त जन अब भी कृतकृत्य होते हैं ।
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*८. श्रीरंगजी* - एक श्रीरंगजी की कथा पद्य टीका के पद्य १७०-१७१ में आ गयी है । ये यदि दूसरे हों तो इनकी कथा अभी प्राप्त नहीं हो सकी है ।
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*९. घमंडीजी* - घमंडीजी भी श्रीवृन्दावन धाम की माधुरी भक्तिरस के रसिक भक्त थे । वर्तमान में रासलीला का प्रचार है, वह घमण्डीजी से ही चली थी । आपका भी वृन्दावन में अति प्रेम था । घमंडी हरि व्यास जी के शिष्य हुये हैं ।
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*१०. युगलकिशोरजी* – इनका युगल विहारी राधाकृष्ण जी के प्रेमी भक्त वृन्दावन धाम से आपका अति प्रेम था । आप धामनिष्ठा के भक्त थे । व्यासदासजी के पुत्र और हरिदासजी के शिष्य थे ।
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*जीव गोस्वामीजी* - (जीव गोस्वामीजी की कथा मूल छप्पय २५१ और पद्य टीका ११. पद्म ३२२ में पहले आ चुकी है) आप भी वृन्दावन धाम में अति अधिक प्रीति रखते थे ।
(क्रमशः)

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