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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३७. निगुणां कौ अंग ९/१२*
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कहि जगजीवन रांमजी, मूरख मनसुख४ ग्यांन ।
प्रेम भगति उपजै नहीं, उपजै मांही आंन ॥९॥
(४. मनसुख=मनचाहा आचरण करने वाला)
संतजगजीवन ज कहते है कि मूरख के अंतर में जो होता है वह ही मूर्खता उसका ज्ञान है। जो उसके अंतर में है वह ही दिखता है प्रेम भक्ति कुछनहीं दिखती है।
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कहि जगजीवन रांमजी, मूरख मोटी साल५ ।
अपणां आप लिये रहै, काम क्रोध घर काल ॥१०॥
{५. साल=वेदना(दुःख)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु मूर्ख जन बहुत दुखी होते हैं उन्हें आंतरिक वेदना होती है वे अपने अंतर में काम क्रोध(जो कि काल का घर है) को लिये रहते हैं ।
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कहि जगजीवन रांमजी, मूरख सुणैं न सीख ।
अठ सिधि नव निधि त्याग हरि, घर घर मांगै भीख ॥११॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि है कि मूर्ख कभी भी किसी की दी हुयी अच्छी शिक्षा नहीं लेते हैं वे सर्व साधन जैसे रिद्धि सिद्धि को भी त्याग कर घर घर भीख मांगते रहते हैं ।
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का कहिये संसार सौं, सबद न समझै सार ।
जगजीवन हरि भगति बिन, अंत पड़ै मुख छार६ ॥१२॥
(६. छार=धूल या राख)
संतजगजीवन जी कहते हैकि इस संसार की क्या बात करें ये किसी भी शब्द अर्थात रामनाम का महत्व नहीं जानते और फिर हरि की भक्ति के बिना अंत समय में मलिनता को प्राप्त होते हैं ।
(क्रमशः)

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