रविवार, 26 मई 2024

*दीक्षित दूसर जन्म भयो सुन*

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*दादू एता अविगत आप थैं, साधों का अधिकार ।*
*चौरासी लख जीव का, तन मन फेरि सँवार ॥*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*भोग लगावत साधु लडावत,*
*भागवतं कहि भक्ति बधावै ।*
*ले धन चोर चल्योउन संगहि,*
*आत धनि जन में छिप जावै ॥*
*दीक्षित दूसर जन्म भयो सुन,*
*स्वामिन पै डरि कान फुकावै ।*
*आनि गह्यो कहि मैं न लियो जब,*
*हाथ दियो दिव नांहिं जरावै ॥४०४॥*
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चतुर्भुजजी गाँड़वान देश में रह कर नाना प्रकार के भोग भगवान् के लगाते थे और संतों को बड़े लाड प्यार से जिमाते थे । श्रीमद्भागवत् की कथा सुनाकर भगवद्भक्ति का विस्तार करते थे ।
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एक दिन एक चोर किसी धनी मनुष्य का धन लेकर भागा और चतुर्भुजजी की कथा में आकर कथा सुनने लगा । उसके पीछे धनी खोजियों और राज पुरुषों के साथ उसके खोजों को देखते हुये वहाँ आ गये । चोर, चतुर्भुज की कथा के श्रोताओं में छिपा हुआ बैठा था । धनी उसको पहचान न सका किन्तु खोज आगे नहीं जाते थे । इससे धनी आदि सब वहाँ ही ठहर गये ।
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कथा के एक प्रसंग में एक बात आई कि- "जो मनुष्य भागवत् मंत्र की दीक्षा लेता है उस समय उसका दूसरा जन्म हो जाता है । वह बात सुनकर चोर ने सोचा कि धनी और राज पुरुष धन भी नहीं छोड़ेगे और मुझे दंड भी देंगे । अतः मैं दीक्षा ले लूँ तो बच जाऊँगा । उसने इस डर से कथा समाप्ति पर सब धन कथा पर चढ़ाकर चतुर्भुजजी को गुरु बना लिया । मंत्र दीक्षा ले ली अर्थात् कान में मंत्र सुन लिया ।
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जब श्रोतागण उठे तब खोजियों ने उसका खोज पहचान कर उसे पकड़ लिया । घनी ने कहा- "यह मेरा धन चुरा कर लाया है ।" उसने कहा- "मैंने इस जन्म में तो किसी की चोरी नहीं की है ।" अंत में सत्यासत्य का निर्णय करने के लिये लोहे का तप्त गोला हाथ पर रख कर पूछने की व्यवस्था की । गोला अग्निवर्ण करने "यह गोला हाथ में लेकर कहो कि तुम्हारे धन की मैने चोरी नहीं की है ।" उसने गोला हाथ में रख कर विश्वासपूर्वक कहा- "मैंने इस जन्म में चोरी नहीं की हो तो मेरा हाथ नहीं जले ।" प्रभु ने उसकी रक्षा की, हाथ गर्म भी नहीं हुआ ॥
(क्रमशः)

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