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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ६९/७२*
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कहि जगजीवन लहि डरौ, ए हरि उत्तम अंन ।
सरस सिरै कण बिराजै, रांम पिछांणैं जंन ॥६९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार से व्यर्थ ही भयभीत हो वे प्रभु तो आनंद प्रदायी है जो कण कण में विराजते हैं । इसे जानता कोइ विरला ही है ।
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कहि जगजीवन लहि डरौ, घर मांहि आई जारि११ ।
गगनै खेती नीपजै, जे हरि बारिषै बारि१२ ॥७०॥
(११. जारि=कुलटा स्त्री) (१२. बारि=जल)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कुबुद्धि कुलटा स्त्री की भांति है जो आने पर देह रुपी घर का नाश कर देती है । और जब सद्बुद्धि रुपी वर्षा होती है तो राम नाम की खेती होती है ।
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स सतगुरु म मूल हरि, झी हरि झिलि मिलि नूर ।
कहि जगजीवन ए त्रिय अक्शर, नांम नांम भरपूर ॥७१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सतगुरु महाराज व प्रभु से ही जो कि जीवन मूल है से ही संसार में झिलमिल है । प्रकाश है ज्ञान है । तेज है । गुरु, ईश्वर व ज्ञान ये तीन ही प्रभु नाम से भरपूर है ।
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दा हरि दरसन रांमजी, त हरि तत निवास ।
न अनहद मुख प्रवर्ति, सु कहि जगजीवनदास ॥७२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु देना है तो दर्शन की कृपा करें । जिसमें ब्रह्म तत्व रहता है । व अनहद सुन पायें ऐसी स्थिति बन जाये ऐसी कृपा कीजिये ।
(क्रमशः)

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