गुरुवार, 16 मई 2024

*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ६९/७२*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ६९/७२*
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कहि जगजीवन लहि डरौ, ए हरि उत्तम अंन ।
सरस सिरै कण बिराजै, रांम पिछांणैं जंन ॥६९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार से व्यर्थ ही भयभीत हो वे प्रभु तो आनंद प्रदायी है जो कण कण में विराजते हैं । इसे जानता कोइ विरला ही है ।
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कहि जगजीवन लहि डरौ, घर मांहि आई जारि११ ।
गगनै खेती नीपजै, जे हरि बारिषै बारि१२ ॥७०॥
(११. जारि=कुलटा स्त्री) (१२. बारि=जल)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कुबुद्धि कुलटा स्त्री की भांति है जो आने पर देह रुपी घर का नाश कर देती है । और जब सद्बुद्धि रुपी वर्षा होती है तो राम नाम की खेती होती है ।
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स सतगुरु म मूल हरि, झी हरि झिलि मिलि नूर ।
कहि जगजीवन ए त्रिय अक्शर, नांम नांम भरपूर ॥७१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सतगुरु महाराज व प्रभु से ही जो कि जीवन मूल है से ही संसार में झिलमिल है । प्रकाश है ज्ञान है । तेज है । गुरु, ईश्वर व ज्ञान ये तीन ही प्रभु नाम से भरपूर है ।
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दा हरि दरसन रांमजी, त हरि तत निवास ।
न अनहद मुख प्रवर्ति, सु कहि जगजीवनदास ॥७२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु देना है तो दर्शन की कृपा करें । जिसमें ब्रह्म तत्व रहता है । व अनहद सुन पायें ऐसी स्थिति बन जाये ऐसी कृपा कीजिये ।
(क्रमशः)

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