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*दादू चारै चित दिया, चिन्तामणि को भूल ।*
*जन्म अमोलक जात है, बैठे माँझी फूल ॥*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*दास कहै प्रभु योग्य रख्यो कुछ,*
*काढि करो सु प्रभात हि आवै ।*
*संत जिमाय दिये करि भोजन,*
*पाय सुखी सब वे यश गावै ॥*
*भूख लगी हरि याम गई मुर१,*
*कोप करै हम गैल छुटावै ।*
*आय धरे शत दो रुपया किन,*
*ले शिर मार कहा गुरु तावै२ ॥४०१॥*
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आपके वचन सुनकर एक शिष्य बोला- "ठाकुरजी भूखे रह जाते हैं, इसलिए उनके भोग के योग्य कुछ रख छोड़ा है ।" आपने कहा- "वही निकाल कर संतों के लिए भोजन बनाओ । भगवान् के लिये प्रातः और आ जायगा ।"
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शिष्य ने रसोई बनाकर संतों को जिमा दिया । संत भोजन पाकर प्रसन्न हुये और गदाधरदासजी की संत सेवा की रीति देखकर वे कहने लगे- "आपका यश सब जगत गायेगा ।"
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प्रातः काल कुछ नहीं आया । समय पर प्रभु के भोग नहीं लगा । हरि को तथा भक्तमाल सबको भूख लगी थी । एक के तीन१ पहर बीत गये थे । तब आपके एक शिष्य ने क्रोध करके कहा- "देखो, अब तक भोग नहीं लगा है, हम सब लोग भूखों मरते हैं, न जाने विधाता इन से हमारा पीछा कब छुड़ायेगा ?"
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उसी समय कोई भक्त आया और गदाधरदासजी के सामने दो सौ रुपये भेंट रखी । तब जोश२ में आकर गुरुजी ने क्रोध करने वाले शिष्य के लिये कहा- "ये रुपये लेकर इसके शिर में मारो, जितनी इच्छा हो उतना पाये, भूख से व्याकुल हो रहा है ।"
(क्रमशः)

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