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*देख दीवाने ह्वै गए, दादू खरे सयान ।*
*वार पार कोई ना लहै, दादू है हैरान ॥*
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*साभार ~ @Subhash Jain*
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एक बहुत पुराने देश में और बहुत पुराने दिनों में एक राजा ने एक अदभुत दान उस देश के सौ ब्राह्मणों को दिया था। उसने कहा था कि मेरे पास एक बड़ी भूमि है, तुम इस भूमि में से जितनी घेर लोगे तुम्हारी हो जाएगी।
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बहुमूल्य भूमि थी, राजा ने अपने जन्म-दिन के उत्सव में देश के सौ बड़े ब्राह्मणों को बांट देनी चाही थी। वे ब्राह्मण तो खुशी से नाच उठे। एक ही शर्त थी, जो जितनी उस जमीन को घेर लेगा, जितनी बड़ी दीवाल बना लेगा जमीन पर, वह जमीन उसकी हो जाएगी।
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अब सवाल यही था कि कौन कितनी बड़ी बना ले ? ब्राह्मणों ने अपने घर-द्वार बेच दिए, अपने कपड़े भी बेच दिए, एक-एक लंगोटियां भर बचा लीं, क्योंकि सस्ते में बहुत बहुमूल्य जमीन मिलती थी। और उन्होंने दीवालें बनाईं। और जितनी जो जमीन घेर सकता था उसने घेर ली। इस घेरने में एक और आकर्षण था, राजा ने यह भी कहा था कि जो सबसे ज्यादा जमीन घेरेगा उसे मैं राजगुरु बना दूंगा।
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तो एक तो जमीन घेरने का फायदा था, बहुमूल्य जमीन मुफ्त, सिर्फ घेरने के मूल्य पर मिलती थी। और दूसरा, सबसे ज्यादा घिर जाए तो राजा के राजगुरु होने का भी सौभाग्य मिलता था।
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छह महीने का वक्त दिया था। फिर छह महीने के बाद राजा गया और उन ब्राह्मणों से कहा: मैं खुश हूं कि तुमने काफी जमीनें घेरी हैं, अब मैं पूछने आया हूं कि सबसे ज्यादा जमीन का घेरा किसका है ? एक ब्राह्मण खड़ा हुआ और उसने कहा कि इसके पहले कि कोई कुछ कहे, मैं दावा करता हूं कि मेरा ही घेरा सबसे बड़ा है।
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सारे ब्राह्मण हंसने लगे, राजा भी हंसा, क्योंकि वह गांव का दरिद्रतम ब्राह्मण था और किसी को भी यह आशा नहीं थी कि उसने बड़ा घेरा बनाया होगा। और ब्राह्मणों को तो भलीभांति पता था कि उसने छोटा सा घेरा बनाया है, कुछ थोड़ी सी लकड़ी-वगैरह लगा कर, थोड़ी सी जमीन घेरी है।
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लेकिन जब दावा किया गया था तो निरीक्षण के लिए राजा को जाना पड़ा। वे सौ ब्राह्मण भी गए। वहां जाकर, पहले ही सबको शक हुआ था कि मालूम होता है उसका दिमाग खराब हो गया है। क्योंकि लोगों ने तो मीलों लंबे जमीन के टुकड़े घेर लिए थे।
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वहां जाकर तो निश्चय हो गया कि वह पागल हो गया है। उसने थोड़ा सा जमीन का टुकड़ा घेरा था, कुछ लकड़ियां बांधी थीं, लेकिन रात, मालूम होता था उसमें भी उसने आग लगा दी थी। अब वहां कोई घेरा नहीं था। सारी लकड़ियां जली हुई पड़ी थीं। राजा ने कहा: मैं समझ नहीं पा रहा, आपकी दीवाल कहां है ?
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उस ब्राह्मण ने कहा: मैंने दीवाल बनाई थी, मैंने लकड़ियां लगाई थीं, लेकिन फिर रात मुझे खयाल आया कि चाहे मैं कितनी ही बड़ी जमीन घेर लूं, जो जमीन घिरी हुई है वह छोटी ही होगी, बड़ी नहीं हो सकती। आखिर जो चीज घिरी है वह छोटी ही होगी, बड़ी नहीं हो सकती। तो रात मैंने अपने घेरे में आग लगा दी। अब मेरी जमीन पर कोई घेरा नहीं है। इसलिए मैं दावा करता हूं कि मैंने सर्वाधिक जमीन घेरी है। कोई घेरा नहीं मेरी जमीन पर।
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राजा उसके पैरों पर गिर पड़ा और उसने कहा: तुम अकेले ही ब्राह्मण हो, बाकी सभी वैश्य हैं। वे निन्यानबे लोगों ने जमीन घेरी है, गणित का हिसाब रखा है, नाप-जोख की है। तुम अकेले आदमी ब्राह्मण हो। तुम्हारा जो घेरा था वह भी तुमने तोड़ दिया। जिसका कोई घेरा नहीं है वही तो ब्रह्म को जान पाता है, वही तो ब्राह्मण हो जाता है। वह ब्राह्मण राजगुरु बना दिया गया। उसने एक अदभुत साहस किया, घेरा तोड़ देने का साहस। और घेरा तोड़ते ही सब कुछ उसका हो गया।
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यह कहानी अंत में इसलिए कह रहा हूं, मन पर घेरे हैं और मन के घेरे को जो तोड़ देगा वह ब्रह्म को जान लेता है। मन के नाप-जोख हैं, इंच-इंच, फीट-फीट बना कर हमने दीवाल खड़ी की है, उसी दीवाल में हम जिंदा रहने के आदी हो गए हैं, उसी से हम पीड़ित और परेशान हैं, और उसी के कारण हम क्षुद्र हो गए हैं।
और विराट, जो कि निरंतर मौजूद है परमात्मा, उससे हमारा कोई संबंध नहीं रह गया है। उससे संबंध हो सकता है। लेकिन जो उस ब्राह्मण ने किया था उस रात, किसी रात आपको भी वही करना पड़ेगा। उसने जो घेरा बनाया था, आग लगा दी थी।
ओशो, अंतर की खोज-१

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