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*कुछ नाहीं का नाम धर, भरम्या सब संसार ।*
*साच झूठ समझै नहीं, ना कुछ किया विचार ॥*
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*साभार ~ @Subhash Jain*
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एक स्त्री के तुम प्रेम में पड़ गए। फिर विवाह का संयोजन किया। चला, जादू शुरू हुआ ! विवाह का आयोजन जादू की शुरुआत है। अब एक भ्रांति पैदा करनी है। यह स्त्री तुम्हारी नहीं है, यह तुम्हें पता है अभी। अब एक भ्रांति पैदा करनी है कि मेरी है, तो बैंड—बाजे बजाए, बारात चली, घोड़े पर तुम्हें दुल्हा बना कर बिठाया। अब ऐसे कोई घोड़े पर बैठता भी नहीं।
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अब तो सिर्फ दुल्हा जब बनते हैं, तभी घोड़े पर बैठते हैं। छुरी इत्यादि लटका दी। चाहे छुरी निकालना भी न आता हो, चाहे छुरी से साग—सब्जी भी न कट सकती हो; मगर छुरी लटका दी। मोर—मुकुट बांध दिए। बड़े बैंड—बाजे, बड़ा शोरगुल——चली बारात ! यह भ्रांति पैदा करने का उपाय है। यह एक मनोवैज्ञानिक उपाय है। तुम्हें यह विश्वास दिलाया जा रहा है: कोई बड़ी महत्वपूर्ण घटना घट रही है ! भारी घटना घट रही है !
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फिर मंत्र, यज्ञ—हवन, पूजा— पाठ… चलती है प्रक्रिया लंबी। वह प्रक्रिया सिर्फ मनोवैज्ञानिक है, हिप्नोटिक है। उसका पूरा उपाय इतना है कि यह सम्मोहन गहरा बैठ जाए, कि घटना ऐसी घट गई कि अब टूट नहीं सकती। गांठ ऐसी बंध गई कि अब खुल नहीं सकती। फिर कसकर गांठ बांध दी गई है। फिर वेदी के सात चक्कर लगवाए गए हैं और मंत्र पढ़े जा रहे हैं और पंडित—पुरोहित भ्रम पैदा कर रहे हैं कि कोई भारी घटना घट रही है। और सारे समाज के सामने घट रही है।
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तुम्हारे भीतर विश्वास बिठाया जा रहा है धीरे—धीरे। यह सुझाव की प्रक्रिया है, जिसको मनोवैज्ञानिक सजेशन कहते हैं। यह मंत्र डाला जा रहा है तुम्हारे भीतर कि अब तुम दोनों के एक—दूसरे के हो गए सदा के लिए। अब मृत्यु ही तुम्हें अलग कर सकती है। इकट्ठे तुम कभी थे ही नहीं, अब मृत्यु अलग कर सकती है——और कोई अलग नहीं कर सकता ! फिर तुम घर आ गए।
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अब तुम इस भ्रांति में पड़ गए हो कि तुम पति हो गए हो और तुमने यह मान लिया है कि यह मेरी पत्नी हो गई है। अब तुम इस भ्रांति में जियोगे। यह जादू… जमूरा आम खाएगा ?… चादर उठाई, आम हो गया। अब यह सारा समाज इसका समर्थन करेगा। अब तुम सोच भी नहीं सकते अलग होने की। अब तो बंध गए——सुख में, दुःख में। अब तो हर हाल में बंध गए। अब छूटने का कोई उपाय ही नहीं है। वह प्रतीति इतनी गहरी बिठाई जाती है कि पत्नी मेरी हो गई, पति मेरा हो गया। कौन किसका है !
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फिर एक दिन तुम्हारा बच्चा पैदा होता है। न पत्नी तुम्हारी थी न पति तुम्हारा था। दो झूठों पर एक तीसरा झूठ चला कि यह बच्चा मेरा है, हमारा है। सब परमात्मा का है। तुम्हारा कैसे हो सकता है ? बच्चे तुमसे आते हैं, तुम्हारे नहीं हैं। तुम केवल मार्ग हो उनके आने के। भेजनेवाला कोई और है। तुम बनानेवाले नहीं हो, बनानेवाला कोई और है।
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मगर भ्रांतियां चलती चली जाती हैं: मेरा बेटा ! फिर मेरे बेटे की प्रतिष्ठा, मेरी प्रतिष्ठा; मेरे बेटे का अपमान, मेरा अपमान। फिर चले तुम। फिर लगे तुम चेष्टा में। अब बेटे को बनाना है ऐसा कि तुम्हारा अहंकार भरे इससे। तुम तो चले जाओ, लेकिन लोग याद करें कि एक बेटा छोड़ गए। उल्लू मर गए, औलाद छोड़ गए ! एक भ्रांति से दूसरी भ्रांति, तीसरी भ्रांति हम खड़ी करते चले जाते हैं। हम एक महल खड़ा कर देते हैं भ्रांतियों का। इस भ्रांति का नाम माया है।
ओशो

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