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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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*भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।*
*साभार : महामण्डलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।*
*#हस्तलिखित०दादूवाणी सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #४३४)*
*राग धनाश्री ॥२७॥**(गायन समय दिन ३ से ६)*
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*४३४. विनती । त्रिताल*
*गोविन्द के चरणों ही ल्यौ लाऊँ ।*
*जैसे चातक बन में बोलै, पीव पीव कर ध्याऊँ ॥टेक॥*
*सुरजन मेरी सुनहु वीनती, मैं बलि तेरे जाऊँ ।*
*विपति हमारी तोहि सुनाऊँ, दे दर्शन क्यों हि पाऊँ ॥१॥*
*जात दुख, सुख उपजत तन को, तुम शरणागति आऊँ ।*
*दादू को दया कर दीजे, नाँहीं व तुम्हारो गाऊँ ॥२॥*
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मैं तो हमेशा गोविन्द भगवान् के चरणों का ही ध्यान करता हूं । जैसे चातक पक्षी स्वाति नक्षत्र की जल बिन्दु के लिये पीव-पीव पुकारता रहता है वैसे ही मैं भी ‘हे प्रियतम ! हे प्रियतम !’ पुकारता हुआ उसीको रट रहा हूं ।
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हे देवताओं के स्वामिन् ! मेरी भी एक विनय सुनिये, मैं आपके चरण-कमलों पर पड़ कर अपनी आपत्ति सुना रहा हूं । सो कृपा करके सुनिये कि आप मुझे दर्शन देवो और मैं किस उपाय से आपको पाऊं ? वह उपाय भी आप बतलाइये ।
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जो भक्त आपकी शरण में आ जाता है वह सब दुःखों से मुक्त हो जाता है और इसी शरीर में सुखी हो जाता है । अतः मैं भी आपकी शरण में आया हूं और आपके नामों का स्मरण करता हूं, अतः आप दर्शन द्वारा मुझे सुखी कीजिये ।
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श्रीमद्भागवत में कहा है कि –
अहो ! विधाता के इस ग्राह्य-पाश में पड़ने पर अत्यन्त आतुर हुए मुझ को जब ये मेरे साथी हाथी ही नहीं छुड़ा सके तो ये हथिनियां तो छुड़ा ही कैसे सकती है ? अब मैं परमाश्र उस श्रीहरि की शरण लेता हूं ।
(क्रमशः)

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