मंगलवार, 11 जून 2024

*भाव बिना संगति कौ अंग*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*दादू बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ ।*
*बाहर दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥*
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पाणी मैं पाथर रहयौ, ऊपरि बध्यौ सिवाल ।
बषनां टाँच्याँ नीकली, माहिं अगनि की झाल ॥२॥
पत्थर काफी समय तक सरोवरादि के जल में रहता है । उसके ऊपर काई जम जाती है । जब उसको निकालकर छैंनी से टाँचा = घड़ा जाता है तब भी उसमें से अग्नि ही निकलती है । यहाँ पत्थर = संसारी जीव है । पानी सत्संग है । सिवाल = काई संसार के विषय भोग हैं । घड़ना = सत्संग सुनाना है । अगनि की झाल = सत्संग सुनने के उपरांत भी संसार के सुखों में ही मनोवृत्ति का रमा हुआ होना है । कहने का आशय यह है कि कुछ भाग्यहीन जीव सत्संग तो खूब सुनते हैं किन्तु सत्संग का उन पर लेशमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता है । वे निरे संसारी के संसारी ही रह गये ॥२॥
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*भाव बिना संगति कौ अंग ॥*
मूल गह्या तौ का भया, फल नहिं खाया बीर ।
जै थणि लागी चीचड़ी, बषनां पियौ न खीर ॥३॥
वृक्ष की मूल को पकड़ लेने पर भी क्या लाभ हुआ क्योंकि उसके फलों को तो खाया ही नहीं । सत्संग में जाने का क्या लाभ, यदि सत्संग में सुनी बातों पर अमल न किया जाए । यह बात वैसे ही है जैसे दुधारु गाय-भैंस के स्तनों के दूध को न पीकर जौंक रुधिर को ही पिये ॥३॥
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*सुगणा निगुणा की पारिख कौ अंग ॥*
बषनां देषि बिचारि करि, जाटि जौंडरी बाही ।
नीच्याँ धरत्याँ नाज नीपना, ऊँचा की तिरड़ाही ॥४॥
बषनांजी  कहते हैं, जाट = कृषक = आत्मजिज्ञासु ने देखि = श्रवण करके, विचारि = सुने हुए उपदेश का मनन करके, जौंडरी = तालाब की जमीन = हृदय में बाही = खेती की = भक्ति स्थापित करी । उस नीची धरती = सजल भूमि में = निर्मल हृदय में नाज नीपना = श्रेष्ठ अन्न उत्पन्न हुआ = आत्म साक्षात्कार हो गया । इसके विपरीत जिन्होंने सत्संग में सुने ज्ञान को हृदय में धारण करके भक्ति नहीं की उनका जीवन वैसे ही व्यर्थ चला गया जैसे ऊपर की भूमि बिना जल के तिरड़ा = फट जाती है और खेती के योग्य नहीं रहती है ॥४॥
इति निगुणा कठौर कौ अंग ॥अंग ११७॥साषी २२३॥
(क्रमशः)

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