🌷🙏 🇮🇳
*#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷🙏 *#बखनांवाणी* 🙏🌷
*https://www.facebook.com/DADUVANI*
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार
विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
.
*दादू
बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ ।*
*बाहर
दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥*
=============
पाणी मैं
पाथर रहयौ, ऊपरि बध्यौ सिवाल ।
बषनां
टाँच्याँ नीकली, माहिं अगनि की झाल ॥२॥
पत्थर
काफी समय तक सरोवरादि के जल में रहता है । उसके ऊपर काई जम जाती है । जब उसको
निकालकर छैंनी से टाँचा = घड़ा जाता है तब भी उसमें से अग्नि ही निकलती है । यहाँ
पत्थर = संसारी जीव है । पानी सत्संग है । सिवाल = काई संसार के विषय भोग हैं ।
घड़ना = सत्संग सुनाना है । अगनि की झाल = सत्संग सुनने के उपरांत भी संसार के
सुखों में ही मनोवृत्ति का रमा हुआ होना है । कहने का आशय यह है कि कुछ भाग्यहीन
जीव सत्संग तो खूब सुनते हैं किन्तु सत्संग का उन पर लेशमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता
है । वे निरे संसारी के संसारी ही रह गये ॥२॥
.
*भाव बिना
संगति कौ अंग ॥*
मूल
गह्या तौ का भया, फल नहिं खाया बीर ।
जै थणि
लागी चीचड़ी, बषनां पियौ न खीर ॥३॥
वृक्ष की
मूल को पकड़ लेने पर भी क्या लाभ हुआ क्योंकि उसके फलों को तो खाया ही नहीं ।
सत्संग में जाने का क्या लाभ, यदि सत्संग में सुनी बातों पर
अमल न किया जाए । यह बात वैसे ही है जैसे दुधारु गाय-भैंस के स्तनों के दूध को न
पीकर जौंक रुधिर को ही पिये ॥३॥
.
*सुगणा
निगुणा की पारिख कौ अंग ॥*
बषनां
देषि बिचारि करि, जाटि जौंडरी बाही ।
नीच्याँ
धरत्याँ नाज नीपना, ऊँचा की तिरड़ाही ॥४॥
बषनांजी कहते हैं, जाट = कृषक =
आत्मजिज्ञासु ने देखि = श्रवण करके, विचारि = सुने हुए उपदेश
का मनन करके, जौंडरी = तालाब की जमीन = हृदय में बाही = खेती की = भक्ति स्थापित
करी । उस नीची धरती = सजल भूमि में = निर्मल हृदय में नाज नीपना = श्रेष्ठ अन्न
उत्पन्न हुआ = आत्म साक्षात्कार हो गया । इसके विपरीत जिन्होंने सत्संग में सुने
ज्ञान को हृदय में धारण करके भक्ति नहीं की उनका जीवन वैसे ही व्यर्थ चला गया जैसे
ऊपर की भूमि बिना जल के तिरड़ा = फट जाती है और खेती के योग्य नहीं रहती है ॥४॥
इति
निगुणा कठौर कौ अंग ॥अंग ११७॥साषी २२३॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें