सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

*धूंधलीनाथजी पद्य टीका*

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*सांई सौं साचा रहै, सतगुरु सौं सूरा ।*
*साधू सौं सनमुख रहै, सो दादू पूरा ॥*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*धूंधलीनाथजी पद्य टीका*
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*इन्दव-*
*द्वादश वर्ष हि नेम लियो गुरु,*
*गांव सु पट्टण पास रहाई ।*
*ग्राम गयो शिष भीख न पावत,*
*एक कुम्हारि उपाय बताई ॥*
*मो सुत साथहिं इन्धन लाकर,*
*पीसन पोवन की मम आई ।*
*आवत शिष्य जु पाँव नहीं धर,*
*बूझ गये गुरु भीख न पाई ॥४२६॥*
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गुरु धूंधलीनाथजी ने अपने शिष्य को कहा- मैने इस पट्टण नगर के पास के इस पर्वत के इस आश्रम में १२ वर्ष समाधि में रहने का नियम लिया है । तुम मेरे पास ही रहना । फिर गुरुजी ने समाधि लगा ली ।
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शिष्य ग्राम में भिक्षा लाने गया किन्तु वहाँ भिक्षा नहीं मिली । एक कुम्हारी ने कुछ दिन भिक्षा देकर कहा- "सदा के लिये भोजन की व्यवस्था का उपाय बताती हूँ- आप मेरे पुत्र के साथ जाकर इस पर्वत के वन से सूखा काष्ठ लाकर ग्राम में बेच के अन्न ला दिया करो । उसके पीसने और रोटी बना कर देने की सेवा मेरे हिस्से में आई अर्थात् वह सब मैं करूँगी ।" नाथ ने वैसा ही किया १२ वर्ष पूरे हो गये ।
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धूंधलीनाथजी की समाधि खुल गई । एक दिन धूंधलीनाथजी ने देखा कि मेरा शिष्य भिक्षा लेकर आ रहा है किन्तु उसके पैर पृथ्वी से ऊपर हैं अधर ही चला आ रहा है । उन्होंने समझा यह भिक्षा माँगकर खाने और मेरी सेवा का फल इ२ सको प्राप्त हुआ है । अतः कल भिक्षा लाने में ही जाऊँगा । दूसरे दिन धूंधलीजी भिक्षा लाने गये, किन्तु किसी ने भी भिक्षा नहीं दी । उनके साथ लोगों ने जैसे वचनों का व्यवहार किया सो घूंधलीनाथजी की शब्दियों द्वारा हो देखिये-
(क्रमशः)

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