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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४४. रस कौ अंग १०९/११२*
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खिजमत१ कीजै खसम की१, तन मन सौंपी सरीर ।
जगजीवन तौ२ पीजिये, हरि जल अम्रित नीर ॥१०९॥
१-१. खिजमत कीजै खसम की=पति की सेवा करे । २. तौ=तब ।
संत जगजीवन जी कह रहैं है कि अपने प्रभु रुपी पति की सेवा तन मन व देह अर्पण कर करें । तभी तुम्हें परमात्मा की कृपा रुपी अमृतजल पान करने को मिलेगा ।
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हरि रस भीजै आतमा, झिलै प्रेम रस दास ।
जगजीवन बरिषै घटा, मिटै जनम की प्यास ॥११०॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हरि कृपा रुपी रस में आत्मा आनंदित है । जिससे प्रभु भक्त सिक्त हो रहे है । ऐसी वर्षा का आनंद अनुभव हो रहा है कि जन्म जन्म की प्यास मिट रही है ।
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मालिक३ मीत४ पिछांणि ले, अल्लह एक अजीज५ ।
कहि जगजीवन चेति चित्त, चाखै अम्रित चीज६ ॥१११॥
३. मालिक=स्वामी । ४. मीत=मित्र(सहायक) । ५. अजीज=प्रिय ।
६. चीज=पदार्थ ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि अपने मालिक और मित्र की पहचान कर ले वह ही सबका प्रिय अल्लाह है । जो चित से जागृत हैं वे ही अमृत पदार्थ पाते हैं ।
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गुणै न रीझै निरगुणी, रीझै सौ रस राखि ।
जगजीवन प्रहरी बिषै, चरन कंवल रस चाखि ॥११२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो निर्गुणी है वह किसी भी गुण को नहीं मानता न आकर्षित होता है । उनके चाहे विषयों के कितने ही पहरे हो वे चरण कमलों का आनंद लेते ही है ।
(क्रमशः)
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