बुधवार, 31 दिसंबर 2025

ईश्वर साकार हैं या निराकार

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*ये दोनों ऐसी कहैं, कीजे कौन उपाइ ।*
*ना मैं एक, न दूसरा, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(५)ईश्वर साकार हैं या निराकार*
एक दिन स्वर्गीय केशवचन्द्र सेन शिष्यों को साथ लेकर दक्षिणेश्वर के काली-मन्दिर में श्रीरामकृष्णदेव का दर्शन करने गये । केशव के साथ निराकार के सम्बन्ध में अनेक बातें होती थीं । 
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श्रीरामकृष्णदेव उनसे कहा करते थे, "मैं प्रतिमा में मिट्टी या पत्थर की काली नहीं देखता, मैं तो उसमें चिन्मयी काली देखता हूँ । जो ब्रह्म हैं, वे ही काली हैं । वे जिस समय क्रियारहित हैं, उस समय ब्रह्म; जब सृष्टि-स्थिति-प्रलय करती हैं, उस समय काली, अर्थात् जो काल के साथ रमण करती हैं । काल अर्थात् ब्रह्म ।"
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उन दोनों में एक दिन निम्नलिखित वार्तालाप हो रहा था ~
श्रीरामकृष्ण - (केशव के प्रति) - किस प्रकार, जानते हो ! मानो सच्चिदानन्दरूपी समुद्र है, कहीं किनारा नहीं है । भक्तिरूपी हिम के कारण इस समुद्र में स्थान-स्थान पर जल बरफ के आकार में जम जाता है । अर्थात् भक्त के पास वे प्रत्यक्ष होकर कभी कभी साकार रूप में दर्शन देते हैं ।
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फिर ब्रह्मज्ञानरूपी सूर्य के उदय होने पर वह बरफ गल जाती है - अर्थात् 'ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या' इस विचार के बाद समाधि होने पर रूप आदि सब अदृश्य हो जाते हैं । उस समय वे क्या हैं, मुख से कहा नहीं जा सकता - मन, बुद्धि, अहं के द्वारा उन्हें पकड़ा नहीं जा सकता ।
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"जो व्यक्ति एक सत्य को जानता है, वह दूसरे को भी जान सकता है । जो निराकार को जान सकता है, वह साकार को भी जान सकता है । जब तुम उस मुहल्ले में गये ही नहीं तो कहाँ श्यामपुकुर है, और कहाँ तेलीपाड़ा, कैसे जानोगे ?"
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श्रीरामकृष्णदेव यह भी समझा रहे हैं कि सभी निराकार के अधिकारी नहीं हैं, इसीलिए साकार पूजा की विशेष आवश्यकता है । उन्होंने कहा, -"एक माँ के पाँच लड़के हैं । माँ ने कई प्रकार की तरकारियाँ बनायी हैं, जिसके पेट में जो सहन होता हो ।"
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इस देश में साकार पूजा होती है । ईसाई मिशनरीगण अमरीका व यूरोप में इस देश के निवासियों को असभ्य जाति कहकर वर्णन करते हैं । वे कहते हैं कि भारतीयगण मूर्ति की पूजा करते हैं, और उनकी बड़ी दयनीय स्थिति है ।
स्वामी विवेकानन्द ने इस साकार पूजा का अर्थ अमरीका में पहले-पहल समझाया । उन्होंने कहा कि भारतवर्ष में 'मूर्ति' की पूजा नहीं होती । -
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.... मैं पहले ही तुम्हें बता देना चाहता हूँ कि भारतवर्ष में अनेकेश्वरवाद नहीं है । प्रत्येक मन्दिर में यदि कोई खड़ा होकर सुने, तो वह यही पाएगा कि भक्तगण सर्वव्यापित्व से लेकर ईश्वर के सभी गुणों का आरोप उन मूर्तियों में करते हैं ।..." -'हिन्दू धर्म' से उद्ध्रत
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स्वामीजी मनोविज्ञान (Psychology) की सहायता से समझाने लगे कि ईश्वर का चिन्तन करने में साकार चिन्तन को छोड़ अन्य कुछ भी नहीं आ सकता । उन्होंने कहा –
"... ईश्वर यदि सर्वव्यापी हैं तो फिर ईसाई लोग गिरजाघर में क्यों उसकी आराधना के लिए जाते हैं ? क्यों वे क्रास को इतना पवित्र मानते हैं ? प्रार्थना के समय आकाश की ओर मुँह क्यों करते हैं ? कैथलिक ईसाइयों के गिरजाघरों में इतनी बहुतसी मूर्तियाँ क्यों रहा करती हैं ? और प्रोटेस्टेन्ट ईसाइयों के हृदय में प्रार्थना के समय इतनी बहुतसी भावमयी मूर्तियाँ क्यों रहा करती हैं ?
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मेरे भाइयों ! मन में किसी मूर्ति के बिना आये कुछ सोच सकना उतना ही असम्भव है, जितना कि श्वास लिए बिना जीवित रहना । ... सच पूछिये तो दुनिया के प्रायः सभी मनुष्य सर्वव्यापित्व का क्या अर्थ समझते हैं ? - कुछ नहीं ! ... क्या परमेश्वर का भी कोई क्षेत्रफल है ? अगर नहीं, तो जिस समय हम सर्वव्यापी शब्द का उच्चारण करते हैं, उस समय विस्तृत आकाश या विशाल भूमिखण्ड की कल्पना हम अपने मन में लाते हैं । इससे अधिक और कुछ नहीं ।..." -'हिन्दू धर्म' से उद्ध्रत
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स्वामीजी ने और भी कहा, "अधिकारियो की भिन्नता के अनुसार साकार पूजा और निराकार पूजा होती है । साकार पूजा कुसंस्कार नहीं है - मिथ्या नहीं है, वह एक निम्न श्रेणी का सत्य है ।" –
"... अगर कोई मनुष्य अपने ब्रह्मभाव को मूर्ति के सहारे अधिक सरलता से अनुभव कर सकता है, तो क्या उसे पाप कहना ठीक होगा ? और जब वह उस अवस्था से परे पहुँच गया है, तब भी उसके लिए मूर्तिपूजा को भ्रमात्मक कहना उचित नहीं है । हिन्दू की दृष्टि में मनुष्य असत्य से सत्य की ओर नहीं जा रहा है, वह तो सत्य से सत्य की ओर, निम्न श्रेणी के सत्य से उच्च श्रेणी के सत्य की ओर अग्रसर हो रहा है ।..." - 'हिन्दू धर्म' से उद्धृत
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स्वामीजी ने कहा, सभी के लिए एक नियम नहीं हो सकता । ईश्वर एक हैं, परन्तु वे भक्तों के पास अनेक रूपों में प्रकट हो रहे हैं । हिन्दू इस बात को समझते हैं । -
"... विभिन्नता में एकता यही प्रकृति की रचना है और हिन्दुओं ने इसे भलीभाँति पहचाना है । अन्य धर्मों में कुछ निर्दिष्ट मतवाद विधिबद्ध कर दिये गये हैं और सारे समाज को उन्हें मानना अनिवार्य कर दिया जाता है ।
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वे तो समाज के सामने केवल एक ही नाप की कमीज रख देते हैं, जो राम, श्याम, हरि सब के शरीर में जबरदस्ती ठीक होनी चाहिए । और यदि वह कमीज राम या श्याम के शरीर में ठीक नहीं बैठती, तो उसे नंगे बदन - बिना कमीज के ही रहना होगा । हिन्दुओं ने यह जान लिया है कि निरपेक्ष ब्रह्म-तत्त्व की उपलब्धि, धारणा या प्रकाश केवल सापेक्ष के सहारे से ही हो सकता है । ..." -'हिन्दू धर्म' से उद्ध्रत 
(क्रमशः)

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