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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग २५/२८*
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सुन्दर यह मन भ्रमर है, सूंघत रहै सुगंध ।
कंवल माहिं निकसै नहीं, काल न देखै अंध ॥२५॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं कि हमारा यह मन भ्रमर के समान गन्ध का भी इतना लोभी है कि वह सुगन्धमय कमल पुष्पों से दूर होना ही नहीं चाहता । इसे इस सुगन्ध में अति अनुराग से अपनी मृत्यु का भी भय नहीं लगता ॥२५॥
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सुन्दर यह मन मीन है, बंधै जिह्वा स्वाद ।
कंटक काल न सूझई, करत फिरै उदमाद ॥२६॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हम को हमारा यह मन मीन के समान जिव्हा का दास प्रतीत होता है; क्योंकि यह भी उसी के तुल्य, विविध खाद्य पदार्थों के रसों के आस्वाद में लुब्ध रहता है । वह इस रस-लोभ में ऐसा मोहान्ध हो गया है कि इसे उस रस के पीछे छिपा हुआ उस का मृत्युकण्टक भी नहीं दिखायी देता ॥२६॥
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सुन्दर मन गजराज ज्यौं, मत्त भयौ सुध नांहिं ।
काम अंध जानै नहीं, परै खाड के मांहिं ॥२७॥
कभी कभी हमारा मन उस मत्त हाथी के समान अपनी चेष्टाएँ करने लगता है । तथा यह इन में इतना उन्मत्त हो जाता है कि उसे अपना यथार्थ भी स्मरण नहीं रहता । यह कभी उसी उन्मत्त अवस्था में नारी के पीछे दौड़ता हुआ खड्डे(गर्त) में गिर कर अपने प्राण भी सङ्कट में डाल लेता है ॥२७॥
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सुन्दर यह मन करत है, बाजीगर कौ ख्याल ।
पंख परेवा पलक मैं, मुवो जिवावत ब्याल ॥२८॥
हमारा यह मन बाजीगर के समान नित्य नये खेल(=तमाशा) करता रहता है । कभी पंख लगाकर किसी पक्षी के समान आकाश में अनेक कौतुक दिखाता है तो कभी मृत सर्प को जीवित करने का अभिनय करता है ॥२८॥
(क्रमशः)

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