मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

*१५. मन कौ अंग २१/२४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग २१/२४*
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सुन्दर यहु मन स्वान है, भटकै घर घर द्वार । 
कहूंक पावै झुंठि कौं, कहूं परै वह मार ॥२१॥
श्रीसुन्दरदासजी का कहना है कि हमारा यह मन कुत्तों के समान आचरण करता हुआ घरों के द्वार द्वार पर फिरता रहता है । वहाँ वह कहीं जूंठी रोटी का एक टुकड़ा पा जाता है तो कहीं उसे लाठी की मार खाकर रोते हुए आगे भागना पड़ता है ॥२१॥
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सुन्दर यहु मन काग है, बुरौ भलौ सब खाइ । 
समुझायौ समुझै नहीं, दौरि करंक हि जाइ ॥२२॥
हमारे इस मन को कौआ भी कहा जा सकता है; क्योंकि कोए के समान यह भी इधर उधर घरों में जाकर गन्दी(सड़ी, गली) वस्तुएँ खाता रहता है । इतना ही नहीं, उसको कितना भी समझाया जाय वह अवसर मिलते ही करङ्क (अस्थि कङ्काल) जैसी अशुभ वस्तुओं की ओर दौड़ने में कोई विलम्ब नहीं करता ॥२२॥
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सुन्दर मन मृग रसिक है, नाद सुनै जब कांन । 
हलै चलै नहिं ठौर तैं, रहौ कि निकसौ प्रांन ॥२३॥
हमारा यह मन भी नादरसिक मृग के समान है । यह भी जब कहीं कर्णप्रिय नाद सुनता है तो यह वहीं अचल हो जाता है, भले ही तब इस नादश्रवण के लोभ में इसके प्राण हो क्यों न चले जाँय ! ॥२३॥
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सुंदर यह मन रूप कौ, देखत रहै लुभाइ । 
ज्यौं पतंग बसि नैंन कै, जोति देखि जरि जाइ ॥२४॥
हमारा यह मन पतङ्ग के समान रूप का लोभी भी है । जैसे पत्तङ्ग के नेत्रों में ज्योति का लोभ इतना समा जाता है कि वह उस के देखने के लोभ में अपने प्राण गवाँ बैठता है, वही स्थिति इस मन की भी है ॥२४॥
(क्रमशः)  

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